Sunday, 25 February 2018

बौद्ध पद्धति से विवाह ...

🌹बौद्ध पद्धति से विवाह ...


न फेरे, न हवन, न सिंदूर, न देववाणी में मंत्र बल्कि आम जन की भाषा में प्रतिज्ञापन, नि:शुल्क साथ में प्रमाण पत्र

1.फेरे क्यों नहीं?

सात फेरों का रहस्य का खुलासा करते हुए डॉ. आंबेडकर लिखते हैं। आर्यों में एक ऐसा वर्ग था जिन्हें देव कहा जाता था जो पद और पराक्रम में श्रेष्ठ माने जाते थे। ये देव आर्य स्त्रियों के साथ पूर्वस्वादन को अपना आदेशात्मक अधिकार समझने लगे थे। स्त्री का उस समय तक विवाह नहीं हो सकता था जब तक की वह पूर्व स्वादन के अधिकार से मुक्त नहीं कर दी जाती थी। तकनीक भाषा में से अवदान कहते हैं। वधु का भाई कहता था कि यह कन्या (उसकी बहन) अग्नि के माध्यम से आर्यमान को अवदान अर्पित करती है। आर्यमान इस पर अपना अधिकार छोड़ दें और वर के अधिकार को बाधित ना करें। इस अवदान के पश्चात अग्नि की प्रदक्षिणा होती है जो सप्तपदी कहलाती है। इसके पश्चात विवाह संबंध वैध और उत्तम माना जाता है। सप्तपदी इस बात का प्रतीक है कि देव ने कन्या पर से अपना पूर्वाधिकार त्याग दिया है और अवदान से संतुष्ट है। यदि देव वर और कन्या को सात पग चलने देते हैं तो यह समझा जाता था कि देवों को मुआवजा स्वीकार है और उसका अधिकार समाप्त हो गया है और कन्या दूसरों की पत्नी बन सकती है। सप्तपदी प्रत्येक विवाह में आवश्यक थी। यह इस बात का द्योतक है कि ऐसी अनैतिकता देवों और आर्यों में किस हद तक मौजूद थी।
(बाबा साहब डॉ अंबेडकर संपूर्ण वांग्मय खंड 8 पृष्ठ 303-304, खंड 7 पृष्ठ 38)

2.सिंदूर क्यों नहीं?

मुगल आक्रमणकारी भी अपने साथ औरतें लेकर नहीं आए। वह विजेता थे ऐसी दशा में उन्होंने हिंदु युवतियों को अपनी हवस का शिकार बनाया। आर्य ब्राह्मणों ने तत्कालीन उत्पन्न परिस्थिति का सामना करने के लिए कम उम्र की बालिकाओं के माथे पर विवाह के प्रतीक चिह्न के रूप में सिंदूर को स्थान दिया। इस प्रकार बाल विवाह प्रथा का जन्म हुआ। मुगल किसी विवाहित स्त्री के साथ छेड़खानी नहीं करते थे। उन्हें जब यह पता चल गया कि जिस युवती के माथे पर सिंदूर लगा है वह विवाहिता है तो वह उसे बिल्कुल स्पर्श नहीं करते थे। आज जब भारत स्वतंत्र हो चुका है हमारे सामने ना अंग्रेज है ना आक्रमणकारी मुगल फिर इस सिंदूर प्रथा का क्या औचित्य?

3.हवन क्यों नहीं?

खाने-पीने की चीजों को जलाना कहाँ का औचित्य है। यह सभी जानते हैं।

सत्यशोधक समाज द्वारा प्रतिपादित विवाह पद्धति

राष्ट्रपिता फूले ने 1876 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की। सत्यशोधक समाज के माध्यम से ज्योतिराव फूले ने ऐसी विवाह पद्धति का निर्माण किया जिसमें कम से कम समय और पैसे में विवाह संपन्न हो। क्योंकि उन्हें इस बात का ज्ञान था कि उनका मूलनिवासी बहुजन समाज गरीबी से लाचार है। साक्षी समाज के लोग अग्नि नहीं, ना मंत्र, ना देववाणी की। यहाँ तो आमजन की भाषा में वर-वधू प्रतिज्ञा पत्र पढ़ते हैं।

सत्यशोधक समाज के माध्यम से 25.9.1873 को पूणे के सीताराम और राधाताई व दूसरा विवाह 7.5.1876 को पुणे में ही ज्ञानोबा कृष्णा और काशीबाई के बीच हुआ। ब्राह्मणों को पता चला तो खलबली मच गई। ब्राह्मणों ने घोषणा कर दी कि सत्यशोधक समाज धर्म और देशद्रोही है। ब्राह्मण वर वधु के माँ-बाप को उनके कुल के नाश का भय दिखाने लगे। गुंडों से धमकियां दिलवाई और गुंडों ने चेतावनी दी कि यदि वह विवाह सत्यशोधक समाज के नियम के अनुसार हुआ तो उन्हें पूरे गांव से बहिष्कृत कर दिया जाएगा। कृष्णा डर के मारे ज्योतिराव के पास गया और ज्योतिराव फुले ने विवाह अपने घर पर संपन्न कराया।
पूना के ब्राह्मण पुरोहितों ने चंदा इकट्ठा करके मुकदमा कर दिया। न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि दूसरी जातियों के लोग ब्राह्मण पुरोहितों के बिना विवाह कर सकते हैं। इस कानूनी निर्णय से महाराष्ट्र को नई धार्मिक दृष्टि मिली और धर्म के नाम पर ब्राह्मणों द्वारा की जा रही लूटपाट बंद होने लगी।

बौद्ध विवाह पद्धति

बौद्धिस्ट विवाह संस्कार में किसी धम्मचारी द्वारा वर वधु को
त्रिशरण और पंचशील ग्रहण कराया जाता है,इस पद्धति से
विवाह में वर-वधू को प्रमाण पत्र भी दिया जाता है प्रतिज्ञापन के तुरंत बाद वर-वधू एक दूसरे के गले में फूलों की माला डालते हैं उपस्थित जनसमूह वर-वधू पर फूलों की वर्षा करता है,और मंगल कामनाओं के साथ बिना किसी ढोंग और कर्मकांड के शादी संपन्न होती है...
         चलो बुद्ध की ओर
              जय भीम
                   नमो बुद्धाय,
महाराणा प्रताप भील थे,राजपूत नहीं




बताने वाली लेखिका असुरक्षित, मिल रही धमकियां

स्त्रीकाल डेस्क

राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व सदस्य और  दलित लेखिका डॉ. कुसुम मेघवाल द्वारा महाराणा प्रताप पर लिखी किताब पर विवाद बढ़ता जा रहा है, जिसमें उन्होंने महाराणा प्रताप को भील कहा है. किताब के अनुसार राजपूत या क्षत्रिय कोई जाति नहीं होती है, उसमें अलग-अलग जाति समूह के लोग होते हैं. किताब बताती है कि किस तरह राजस्थान में भीलों का शासन रहा है, उनके कई राजवंश रहे हैं और महाराणा प्रताप के इर्द-गिर्द, उन्हें मदद करने वालों में भी भील ही रहे हैं.





स्त्रीकाल से बातचीत करते हुए कुसुम मेघवाल ने बताया कि ‘मैंने यह किताब पिछले दो साल पहले लिखी है, जिसमें मैंने शोध के आधार पर लिखा है कि महाराणा प्रताप भील थे, न कि  राजपूत. इसी बात से बौखला कर करणी सेना के सदस्य बनकर लगातार फोन पर जान से मारने की धमकी दी जा रही है.’ उन्होंने बताया कि ‘ पुलिस को 21 अप्रैल को तथाकथित धमकी देने वालों के खिलाफ शिकायत की जा चुकी है, लेकिन अभी तक सुरक्षा की कोई पहल नहीं हुई है. वे राजस्थान की वसुंधरा सरकार पर आरोप लगाती हैं कि उन्होंने ही इन उपद्रवी ताकतों पर कार्रवाई न कर उन्हें शह दे रखा है.’ वे पूछती हैं, ‘ क्या पुलिस किसी घटना के अंदेशा का इंतजार कर रही, कि घटना घट जाए और उसके बाद कोई कार्रवाई की जाए?  यह देश किसी तथाकथित करणी सेना से चलेगा या संविधान से , जो हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है?’ वे स्पष्ट कहती हैं कि ‘आप को किसी बात पर आपत्ति है तो न्यायालय जाओ, या किताब के बदले किताब लिखों या फिर किताब पर प्रतिबंध लगवाओ।’

पढ़ें:  राजस्थान में दलित दमन






इस बीच उन्हें मारने की धमकी वाली खबर मीडिया में आई तो लेखकों बुद्धिजीवियों में बेचैनी है. इसके पहले भी कलबुर्गी, पान्सारे जैसे लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की ह्त्या हो चुकी है. 14 मई को मुस्लिम महिलाओ के संगठन नेशनल वीमेन फ्रंट की प्रदेशाध्यक्ष वाफिया अन्सार ने उदयपुर में उनके निवास पर मुलाकात कर उनसे पूरे  मामले की जानकारी ली. प्रदेशाध्यक्ष वाफिया अन्सार ने डॉ.कुसुम को मिल रही धमकियों को लेकर कहा कि सरकार को जल्द से जल्द ऐसे लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए साथ ही उन्होंने मांग की है कि डॉ.मेघवाल को सुरक्षा मुहैया करवाई जाए. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर डॉ.कुसुम मेघवाल पर किसी भी तरह का प्रहार होता है तो हमारा संगठन चुप नहीं बैठेगा और इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी.
राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन की राष्ट्रीय अध्यक्ष रजनी तिलक ने कहा कि ‘जिन्हें आपत्ति है वे गुंडागर्दी की जगह शोधपूर्ण तरीके से लेखिका की बात काटें.’

दलित विधायकॊ के मुह पर किसका ताला

 प्रसंग : दलित विधायकॊ के मुह पर किसका ताला,

आओ बात करें भारत के सभी राज्यों के sc st के विधायकॊ की
1- प बंगाल - 82 रिजर्व विधायक
2-उ प्र -87 रिजर्व विधायक
3-उत्तराखन्ड - 15रिजर्व विधायक
4- त्रिपुरा - 30 रिजर्व विधायक
5- तमिलनाडु -46रिजर्व विधायक
6-राजस्थान -63 रिजर्व विधायक
7-पंजाब -34 रिजर्व विधायक
8-उडीसा - 57 रिजर्व विधायक
9- नागालैण्ड - 59 रिजर्व विधायक
10-मिजोरम -40रिजर्व विधायक
11-मेघालय -55रिजर्व विधायक
12-मणिपुर -20-रिजर्व विधायक
13-महाराष्ट्र -85रिजर्व विधायक
14-म प्र -85रिजर्व विधायक
15-केरला -16रिजर्व विधायक
17-कर्नाटक -51 रिजर्व विधायक
18-झारखंड -37 रिजर्व विधायक
19- जम्मू कश्मीर -07रिजर्व विधायक
20-हिमाचल प्रदेश -20रिजर्व विधायक
21-हरियाणा -17 रिजर्व विधायक
22-गुजरात -40रिजर्व विधायक
23-गोआ -01रिजर्व विधायक
24-दिल्ली -12 रिजर्व विधायक
25-छत्तीसगढ़ -40रिजर्व विधायक
26-बिहार -39रिजर्व विधायक
27-असम -23रिजर्व विधायक
28- अरुणाचल प्रदेश -60रिजर्व विधायक
29-आंध्र प्रदेश -68रिजर्व विधायक
भारत के इन 1189 रिजर्व विधायको के सामने उना मे दलितो को लोहे के रौड से नंगा करके पीटा जाता है,डान्गावास मे 22 लोग ट्रैक्टर से कुचल दिये जाते हैं, सराहनपुर में दलितों पर सरे आम अत्याचार रुपी ताण्डव होते है ।
शर्म करो बेशर्मों ,सत्ताधारी होकर तुम अपने अधिकार न जान पाऎ।क्या बाबा साहब ने तुम्हें इसीलिए संसद और बिधान सभाओं मे पहुचाया। अस्पतालों मे मरने बाले बच्चे क्या ब्राह्मणों के होंगे । गरीब जनता तुम्हें अपनी समस्याओं के समाधान के लिए शासन मे भेजती हॆ और तुम उन्ही की लाशो का सॊदा करके देश और जनता को गुलाम बनाने मे कोई कसर नही छोडते।
थू हॆ तुम पर बेशरगमों।
इनसे अच्छा तो हमारा डौगी है, घर का बचा हुआ खाना खाकर हमारी सुरक्षा तो करता है,
🌹जय भीम नमो बुध्दाय🌹

भष्टाचार पर एक लेख

दुनिया के भ्रष्टाचार मुक्त देशों में शीर्ष पर गिने जाने वाले न्यूजीलैंण्ड के एक लेखक ब्रायन ने
भारत में व्यापक रूप से फैंलें भष्टाचार पर एक लेख लिखा है। ये लेख सोशल मीडि़या पर काफी वायरल हो रहा है। लेख की लोकप्रियता और प्रभाव को देखते हुए विनोद कुमार जी ने इसे हिन्दी भाषीय पाठ़कों के लिए अनुवादित किया है। –

  *न्यूजीलैंड से एक बेहद तल्ख आर्टिकिल।*


*भारतीय लोग  होब्स विचारधारा वाले है (सिर्फ अनियंत्रित असभ्य स्वार्थ की संस्कृति वाले)*

भारत मे भ्रष्टाचार का एक कल्चरल पहलू है। भारतीय भ्रष्टाचार मे बिलकुल असहज नही होते, भ्रष्टाचार यहाँ बेहद व्यापक है। भारतीय भ्रष्ट व्यक्ति का विरोध करने के बजाय उसे सहन करते है। कोई भी नस्ल इतनी जन्मजात भ्रष्ट नही होती

*ये जानने के लिये कि भारतीय इतने भ्रष्ट क्यो होते हैं उनके जीवनपद्धति और परम्पराये देखिये।*

भारत मे धर्म लेनेदेन वाले व्यवसाय जैसा है। भारतीय लोग भगवान को भी पैसा देते हैं इस उम्मीद मे कि वो बदले मे दूसरे के तुलना मे इन्हे वरीयता देकर फल देंगे। ये तर्क इस बात को दिमाग मे बिठाते हैं कि अयोग्य लोग को इच्छित चीज पाने के लिये कुछ देना पडता है। मंदिर चहारदीवारी के बाहर हम इसी लेनदेन को भ्रष्टाचार कहते हैं। धनी भारतीय कैश के बजाय स्वर्ण और अन्य आभूषण आदि देता है। वो अपने गिफ्ट गरीब को नही देता, भगवान को देता है। वो सोचता है कि किसी जरूरतमंद को देने से धन बरबाद होता है।

*जून 2009 मे द हिंदू ने कर्नाटक मंत्री जी जनार्दन रेड्डी द्वारा स्वर्ण और हीरो के 45 करोड मूल्य के आभूषण तिरुपति को चढाने की खबर छापी थी। भारत के मंदिर इतना ज्यादा धन प्राप्त कर लेते हैं कि वो ये भी नही जानते कि इसका करे क्या। अरबो की सम्पत्ति मंदिरो मे व्यर्थ पडी है।*


*जब यूरोपियन इंडिया आये तो उन्होने यहाँ स्कूल बनवाये। जब भारतीय यूरोप और अमेरिका जाते हैं तो वो वहाँ मंदिर बनाते हैं।*

*भारतीयो को लगता है कि अगर भगवान कुछ देने के लिये धन चाहते हैं तो फिर वही काम करने मे कुछ कुछ गलत नही है। इसीलिये भारतीय इतनी आसानी से भ्रष्ट बन जाते हैं।*


*भारतीय कल्चर इसीलिये इस तरह के व्यवहार को आसानी से आत्मसात कर लेती है, क्योंकि*

1 नैतिक तौर पर इसमे कोई नैतिक दाग नही आता। एक अति भ्रष्ट नेता जयललिता दुबारा सत्ता मे आ जाती है, जो आप पश्चिमी देशो मे सोच भी नही सकते ।

2 भारतीयो की भ्रष्टाचार के प्रति संशयात्मक स्थिति इतिहास मे स्पष्ट है। भारतीय इतिहास बताता है कि कई शहर और राजधानियो को रक्षको को गेट खोलने के लिये और कमांडरो को सरेंडर करने के लिये घूस देकर जीता गया। ये सिर्फ भारत मे है

भारतीयो के भ्रष्ट चरित्र का परिणाम है कि भारतीय उपमहाद्वीप मे बेहद सीमित युद्ध हुये। ये चकित करने वाला है कि भारतीयो ने प्राचीन यूनान और माडर्न यूरोप की तुलना मे कितने कम युद्ध लडे। नादिरशाह का तुर्को से युद्ध तो बेहद तीव्र और अंतिम सांस तक लडा गया था। भारत मे तो युद्ध की जरूरत ही नही थी, घूस देना ही ही सेना को रास्ते से हटाने के लिये काफी था।  कोई भी आक्रमणकारी जो पैसे खर्च करना चाहे भारतीय राजा को, चाहे उसके सेना मे लाखो सैनिक हो, हटा सकता था।

प्लासी के युद्ध मे भी भारतीय सैनिको ने मुश्किल से कोई मुकाबला किया। क्लाइव ने मीर जाफर को पैसे दिये और पूरी बंगाल सेना 3000 मे सिमट गई। भारतीय किलो को जीतने मे हमेशा पैसो के लेनदेन का प्रयोग हुआ। गोलकुंडा का किला 1687 मे पीछे का गुप्त द्वार खुलवाकर जीता गया। मुगलो ने मराठो और राजपूतो को मूलतः रिश्वत से जीता श्रीनगर के राजा ने दारा के पुत्र सुलेमान को औरंगजेब को पैसे के बदले सौंप दिया। ऐसे कई केसेज हैं जहाँ भारतीयो ने सिर्फ रिश्वत के लिये बडे पैमाने पर गद्दारी की।

सवाल है कि भारतीयो मे सौदेबाजी का ऐसा कल्चर क्यो है जबकि जहाँ तमाम सभ्य देशो मे ये  सौदेबाजी का कल्चर नही है

3- *भारतीय इस सिद्धांत मे विश्वास नही करते कि यदि वो सब नैतिक रूप से व्यवहार करेंगे तो सभी तरक्की करेंगे क्योंकि उनका “विश्वास/धर्म” ये शिक्षा नही देता।  उनका कास्ट सिस्टम उन्हे बांटता है। वो ये हरगिज नही मानते कि हर इंसान समान है। इसकी वजह से वो आपस मे बंटे और दूसरे धर्मो मे भी गये। कई हिंदुओ ने अपना अलग धर्म चलाया जैसे सिख, जैन बुद्ध, और कई लोग इसाई और इस्लाम अपनाये। परिणामतः भारतीय एक दूसरे पर विश्वास नही करते।  भारत मे कोई भारतीय नही है, वो हिंदू ईसाई मुस्लिम आदि हैं। भारतीय भूल चुके हैं कि 1400 साल पहले वो एक ही धर्म के थे। इस बंटवारे ने एक बीमार कल्चर को जन्म दिया। ये असमानता एक भ्रष्ट समाज मे परिणित हुई, जिसमे हर भारतीय दूसरे भारतीय के विरुद्ध है, सिवाय भगवान के जो उनके विश्वास मे खुद रिश्वतखोर है।*

लेखक-ब्रायन,
गाडजोन न्यूजीलैंड


 *आज तो इनका चश्मा उतारकर रहूंगा कसम से इनकी भक्ति का नशा उतर जाएगा*🔥
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केंद्र सरकार की संस्था CVC के सर्वे की रिपोर्ट में आया है कि केंद्र सरकार में 67% भ्रष्टाचार बढ़ा है और दिल्ली सरकार में 81% भ्रष्टाचार कम हुआ है । उसके बाद भी भक्त एक आधे अधूरे राज्य के मुख्यमंत्री को कोसते रहते है मुझे समझ नही आता क्यो❓कभी खांसी , कभी शर्ट कभी मफलर कभी चप्पल पर ही बात करेंगे.......

चलो दूसरी बात हम मध्यप्रदेश के संदर्भ में करते है....क्या आपको पता है मध्यप्रदेश बिजली का उत्पादन करता है और अपनी अतिरिक्त बिजली दूसरे राज्यो को बेचता है ....दिल्ली एक ऐसा राज्य है जो बिजली उत्पादन नही करता बल्कि दूसरे राज्यो से बिजली खरीदता है...उसी तारतम्य में दिल्ली मध्यप्रदेश से भी बिजली खरीदता है अब बताईये एक राज्य बेच रहा है और दूसरा राज्य बिजली खरीद रहा है तो प्रश्न ये खड़ा होता है कि किस राज्य के नागरिकों को सस्ती दर पर बिजली मिल रही होगी सोचिए और बताईये❓
*नही पता*❗
चलो हम बताये देते है मध्यप्रदेश जो खुद बिजली बनाता है और दूसरे राज्यो को भी बेचता है वो अपने मध्यप्रदेश के नागरिकों से 200 यूनिट का बिल 1400/- तक बसूलता है, जबकि दूसरी तरफ दिल्ली राज्य जो खुद बिजली नही बनाता वो मध्यप्रदेश से खरीदता है वो अपने दिल्ली राज्य के नागरिकों को 200 यूनिट केवल 400/- से भी दाम में उपलब्ध कराता है🎯
कुछ समझ मे आया ❓
 कैसे आएगा चश्मा जो चढ़ा है पहले चश्मा उतारिये और समझने की कोशिश कीजिये और डेटा आंकड़े जुटाइये तो पता चलेगा भारत के किसी भी राज्य में इतनी सस्ती बिजली कही नही है जितनी दिल्ली सरकार के द्वारा अपने उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराई जा रही है यही तो मूलभूत सुविधाएं होती है जो राज्यो को अपने नागरिकों को कम से कम दाम पर देनी चाहिए।।

याद रखना बिजली बनाकर बेचने वाले राज्य और खरीदने वाले राज्यो की नीयत में अंतर स्पस्ट दिखेगा पर कब ❓ जब चश्मा उतारोगे तब  ||


सनकतंत्र :-

भारतीय स्टेट बैंक की पूर्व चेयरपर्सन अरुंधती भट्टाचार्य ने सेवानिवृत्ति के बाद "नोटबंदी" के क्रियांवन के तरीके की आलोचना की है , यद्दपि वह पद पर रहते हुए इसकी प्रशंसा में कसीदे पढ़ रहीं थीं , रिज़र्व बैंक आफ इंडिया के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी नोटबंदी के फैसले की तिव्र आलोचना कर रहे हैं।

इतने महत्वपुर्ण पदों पर रहे लोग यदि पद पर रहते हुए अपने विचार और राय से सरकार को सही दिशा और सुझाव न देकर सेवानिवृत्ति के बाद उस निर्णय की आलोचना करें जिसके क्रियांवन में वह खुद भागीदार रहे हैं तो उनकी मजबूरी समझी जा सकती है।

दरअसल मौजूदा सरकार सिस्टम में मौजूद विशेषज्ञों के फीडबैक से नहीं चलती बल्कि सर्वोच्च शक्तिशाली पुरूष की सनक से चलती है जिसे बिना सोचे समझे हर काम को "जल्दीबाजी" में करने की आदत है और यही आदत उसकी सनक को विध्वंसकारी बनाता है और उसका हर निर्णय उसके सनक और जल्दीबाजी का प्रतिबिंब होता है।

अपनी सनक को तुरंत पूरा करने के लिए देश का वह महा शक्तिशाली पदाधिकारी सभी महत्वपुर्ण पदों पर 14 साल में अपने चुने "यस बाॅस" चरित्र के अधिकारियों को बैठाता जा रहा है जिससे उसकी सनक पूरी करने में कोई विलंब ना हो।

रिज़र्व बैंक आफ इंडिया के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन इस समय भारत ही नहीं दुनिया के सबसे योग्य अर्थशास्त्रियों में से एक हैं , इनको रिज़र्व बैंक आफ इंडिया के गवर्नर पद पर दूसरा कार्यकाल मिलना ही चाहिए था परन्तु रघुराम राजन "यस बाॅस" चरित्र वाले नहीं थे इसलिए एक अन्जान और कम योग्यता वाले अंबानी के एक पूर्व नौकर को रिज़र्व बैंक आफ इंडिया का गवर्नर बना दिया गया।

और रिज़र्व बैंक आफ इंडिया ही क्युँ ? हर पद पर चुन चुन कर "यस बाॅस" प्रवृत्ती वाले लोगों को बैठाया गया और बैठाया जा रहा है।

मुख्य चुनाव आयुक्त श्री जोती का ताजा उदाहरण सबके सामने है , गुजरात में तत्कालीन मुख्यमंत्री के तमाम विभागों का सचिव रहे इस व्यक्ति में इतना साहस नहीं कि गुजरात और हिमांचल प्रदेश के चुनाव की घोषणा वह एक साथ कर दे क्युँकि गुजरात के उनके आका के दो कार्यक्रम प्रस्तावित थे।

न्यायपालिका की स्थिति सबको पता ही है , एक मुख्य न्यायधीश जस्टिस ठाकुर का प्रधानमंत्री का सर्वाजनिक रूप से रोना न्यायपालिका की वास्तविक स्थिति को दर्शाता है।

पिछली सरकारों के समय में चुन चुन गाहे बगाहे कर उन पर आक्रमण करती अदालतें अब खामोश हो गयी हैं , बोलेंगी तो न्याय जी की पगार रोक ली जाएगी।

मीडिया के बारे में क्या कहने ? भाजपा शासित छत्तीसगढ़ की पुलिस गाज़ियाबाद से एक पत्रकार विनोद वर्मा को उठा ले जाती है और मीडिया अपनी बिरादरी के इस पत्रकार के साथ हो रहे आत्याचार को ना दिखा कर "बगदादी के प्लान" को दिखाता रहता है।

पिछले लगभग 4 सालों में देश के सभी संवैधानिक और महत्वपुर्ण पदों और सारी व्यवस्थाओं को बंधक और गुलाम बनाकर उनकी आवाज़ दबा दी गयी है।

देश में सिर्फ़ एक ही आवाज़ है जो रेडियो पर "मन की बात" से लेकर महीने में 50-50 जगह भाषणबाजी में सुनाई देती है और यहाँ तक कि सरकार के भी सारे महत्वपुर्ण मंत्री गूँगे हो चुके हैं।

देश का सारा सिस्टम अपने शोध और समझ से नहीं बल्कि एक व्यक्ति के सनक से चल रहा है।

नरेन्दूद्दीन तुगलक , इस व्यक्ति के सनक के आगे राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज जैसी तेज़ तर्रार आवाज़ें खामोश हो गयीं हैं।


दरअसल , देश में लोकतन्त्र नहीं "सनकतंत्र" है।

ब्राह्मणी खडयंत्र प्रथम मुख्यमंत्री नहीं बन सके

 ब्राह्मणी   खडयंत्र  के चलते कुर्मी छोटूराम चंद्राकर मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री   नहीं बन  सके थे :-


मध्यप्रदेश का प्रथम मुख्यमंत्री छोटूराम चंद्राकर को बनना था . छोटूराम  चंद्राकर जाति से कुर्मी थे .लन्दन में जवाहरलाल नेहरु के क्लासफेलो  रह चुके थे .भारत में वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे .
तीन  ब्राह्मण नेता दिल्ली पहुंचे , ब्राह्मण उमाशंकर दीक्षित , ब्राह्मण शम्भुनाथ शुक्ल , और ब्राह्मण द्वारका प्रसाद मिश्र , जवाहरलाल नेहरु से मिलने . इन तीनों ने जवाहरलाल नेहरु से जानना  चाहा की मध्यप्रदेश का प्रथम मुख्यमंत्री कौन बनेगा ?  जवाहरलाल नेहरु ने उत्तर दिया -- मैंने छोटूराम चंद्राकर का नाम तय कर दिया है . उन तीनों ने  जवाहरलाल नेहरु को धन्यवाद् दिया  और बाहर निकले .
 तीनों ब्राह्मण नेताओं ने बाहर आकर तय किया कि किसी भी कीमत पर कुर्मी छोटूराम चंद्राकर को मुख्यमंत्री नहीं  बनने देंगे , हर कीमत पर मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री ब्राह्मण को बनायेंगे .
        इन तीनों ब्राह्मण नेताओं ने दिल्ली से ही ब्राह्मण नेता रविशंकर शुक्ल को फ़ोन लगाया , और कहा कि -- रविशंकर , कल हम तीनों ब्राह्मण नेता रायपुर आ रहे हैं , तुम रेलवे स्टेशन पर कार लेकर हमारा इन्तजार करना . हम  लोग तुझे मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बना सकते हैं , हम लोग जो -जो  कहें , तुम  वही करो .
     अगले दिन तीनों ब्राह्मण नेता रायपुर पहुंचे .रेलवे स्टेशन पर रविशंकर शुक्ल  कार लेकर इन्तजार करता मिला .चारों ब्राह्मण नेता छोटूराम  चंद्राकर के घर पहुंचे .( तय प्लानिंग के अनुसार ).
उस वक्त छोटूराम चंद्राकर गंजी -जांघिया  पहने अपनी  गाय -भैंसों को सानी -भूसा करा रहे थे .उनका हाथ गीले भूसे से सना था . छोटूराम चंद्राकर  कार की तरफ बढे .   रविशंकर शुक्ल ने तय प्लानिंग के अनुसार तुरंत छोटूराम चंद्राकर का पैर पकड़ लिया .  छोटूराम चंद्राकर ने कहा --' रविशंकर तुम ब्राह्मण होकर मेरा पैर क्यों पकड़ रहे हो ? यह अधर्म है , पैर छोड़ो."   छोटूराम  चंद्राकर हाथ भी नहीं  लगा सकते थे ,क्योंकि उनके हाथ में गीला भूसा लगा हुआ था .भूसे से ब्राह्मण रविशंकर शुक्ल का कपड़ा ख़राब हो जाता .
                         ब्राह्मण द्वारिका प्रसाद  मिश्र ने कहा कि --" छोटूराम जी , जब तक आप रविशंकर को आशीर्वाद नहीं देंगे , ये आपका पैर नहीं छोड़ेगा ."    छोटूराम चंद्राकर ने कहा -- " कैसा आशीर्वाद ?"  ब्राह्मण द्वारिका प्रसाद मिश्र बोला -- " क्या आप नहीं चाहते कि रविशंकर मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बने ?" छोटूराम चंद्राकर ने कहा --" मैं क्यों नहीं चाहूँगा ? मैं तो चाहता हूँ कि रविशंकर मुख्यमंत्री बने , मुझे ख़ुशी होगी (छोटूराम चंद्राकर घटना से अनजान थे ).
   द्वारिका प्रसाद मिश्र ने छोटूराम चंद्राकर से कहा --" तो फिर चलिए , और जवाहरलाल जी को फोन करिए , और बोलिए कि रविशंकर शुक्ल को मुख्यमंत्री बना दीजिये , हमें कोई आपत्ति नहीं ."

  चारों ब्राह्मण नेता छोटूराम चंद्राकर को रायपुर ले गए , ब्राह्मण उमाशंकर दीक्षित ने जवाहरलाल नेहरु को फोन लगाया , और  नेहरु से बोला -- पंडित जी , मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल को बना  दीजिये , छोटूराम चंद्राकर जी को कोई आपत्ति नहीं है , छोटूराम जी रविशंकर का नाम प्रस्तावित कर चुके हैं , लीजिये -छोटूराम जी से बात कर लीजिये ."
 छोटूराम जी ने फोन लिया  और जवाहरलाल से कहा -- "  रविशंकर शुक्ल को मुख्यमंत्री बना दीजिये , मुझे कोई आपत्ति नहीं ." जवाहरलाल नेहरु ने कहा --" जब आपको कोई आपत्ति नहीं , तो मुझे क्या आपत्ति होगी ?" इतना कहकर जवाहरलाल नेहरु ने फोन काट दिया .

ब्राह्मण रविशंकर शुक्ल मुख्यमंत्री बन गया . मुख्यमंत्री बनते ही छोटूराम  चंद्राकर पर  तीस से ज्यादा फर्जी मुकदमे  लगाकर जेल में  डाल दिया . छोटूराम चंद्राकर जीवन भर के लिए राजनीति और समाजसेवा भूल गए .


भारत में रूलिंग व्यवस्था को देखें तो समझ में आएगी कि भारत democratic state कम, पर theological स्टेट ज्यादा है। विज्ञान और तर्क पर धर्म एवं परम्परा भारी नजर आता है।
                 दुनिया में sceintific स्टेट हीं विकसित हुई है। ऑर्थोडॉक्स, थियोलॉजिकल व्यवस्था में जबरदस्त मार काट एवं रेसियल स्ट्रगल के कारण त्रास्दी देखी जा रही है। जिसका परफेक्ट उदाहरण सीरिया जैसे मध्य एशिया के अनेकों स्टेट हैं।
         भारत के संदर्भ में डेमोक्रेटिक व्यवस्था में गवर्नेंस चेंज प्रत्येक पाँच वर्षों में तय है, जो देश का कानून बनाने के साथ रूलिंग करती है।
       यहाँ वोट के द्वारा नेतृत्व मिलती है, जिसमें बंशवाद के बेस पर नेशनल पार्टी के साथ अधिकाँश स्टेट पार्टी है। इन अधिकांश दलों का एस्पिरेशन  धर्म, जाति, रीजन एवं कोई इमोशनल मुद्दा है। कई ईमानदार लेजिस्लेचर मेम्बर्स जो कुछ देश का भला चाहते हैं, वे पार्टी लाइन पर बंधे रहने के कारण बंधुआ लेजिस्लेचर बन कर असमर्थ हैं। फिर भी ये पांच साल में लोगों के इच्छा से चेंज हो जाते हैं।
               पर, लोकतंत्र का शेष तीनों अंग ब्यूरोक्रेसी, ज्यूडिशियरी एवं मीडिया मेम्बर्स वही रह जाते हैं।
     यानि, वोट के द्वारा लोकतंत्र का पाँच साल में सिर्फ पोलिटिकल स्ट्रक्चर बदलता है, शेष सभी अंग मेंबर्स वही रह जाते हैं।
         भारतीय रूलिंग प्रणाली में लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ कॉरपोरेट व्यवस्था, सामाजिक सांस्कृतिक एवं धार्मिक व्यवस्था भी है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था से ज्यादा मजबूत है।
          रूरल एरिया में तो सांस्कृतिक व्यवस्था हीं  सिर्फ नजर आती है, लोकतांत्रिक व्यवस्था तो बिल्कुल नजर नहीं आती।
               इनका दैनिक से लेकर सलाना कार्य हीं सांस्कृतिक धार्मिक व्यवस्था द्वारा गवर्न होती है। इस व्यवस्था का प्राइम मिनिस्टर ब्राहमण होते हैं, जो पाँच सालों में नहीं बल्कि कई जेनेरेशन तक चेंज नहीं होते। इस व्यवस्था में वोट की कोई भूमिका नहीं है। यानि पूरी तरह से ये जातिवादी एवं बंशवादी व्यवस्था है।
              इस व्यवस्था से वे पञ्चाङ्ग एवं कई धार्मिक किताबें से निर्णय करते हैं, किसके साथ, किस दिन, क्या खाना है? किस दिन क्या पहनना है, किससे छूत करना है। किस दिन शादी करनी है, किस दिन गृहप्रवेश एवं इसके रिचुअल्स के  रॉ मटेरियलस
क्या होगा इत्यादि?
        तो फिर भारत थियोलॉजिकल स्टेट है कि डेमोक्रेटिक स्टेट आप खुद डिसाइड कर सकते हैं?
        अब डेमोक्रेटिक व्यवस्था के तीन अंगों में ज्यूडिशियरी बिल्कुल हीं जातिवादी एवं बंशवादी व्यवस्था है, जिसे वोट के द्वारा पाँच साल में नहीं बदल सकते, नहीं कई सालों में भी बदल सकते।
         मीडिया हाउस के साथ कॉरपोरेट भी पूरी तरह से जातिवादी एवं बंशवादी व्यवस्था है, जिसे कई सालों में भी नहीं बदल सकते, नहीं जनता मीडिया द्वारा अनर्गल चीजें थोपने के बावजूद अंकुश लगा सकती है।
           ब्यूरोक्रेटिक व्यवस्था जिसे मेरिटोक्रेसी बनाया गया है, यह 60 से 65 की उम्र तक कायम रहता है, इसमें भी जबरदस्त जातिवाद देख सकते हैं। इस व्यवस्था में भी खास जाति का वर्चस्व है, जबकि मेजोरिटी हाशिये वर्ग के लोग का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है। ये भी जनता के प्रति जबाबदेह नहीं है। क्योंकि जनता के वोट से इसका कोई तालुकात नहीं है।
           यानि, कुल मिलाकर भारत के सिर्फ पोलिटिकल स्ट्रक्चर ही थोड़ा ट्रांसपेरेंट, रिप्रिजेंटेटिव एवं डेमोक्रेटिक है। निस्संदेह भारतीय व्यवस्था का मुश्किल से 10% पोलिटिकल हिसा को छोड़ अधिकांशतः थियोलॉजिकल एवं ग़ैरवैज्ञानिक है।
         अगर भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है, तो सांस्कृतिक -धार्मिक ग़ैरवैज्ञानिक व्यवस्था को शून्य कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को रिप्रिजेंटेटिव बनाना होगा।
           यानि, सिर्फ लेजिस्लेचर मेम्बर्स को ही नहीं, बल्कि खास योग्यता फिक्स कर जज, कॉरपोरेट मालिक, मीडिया प्रमुख एवं ब्यूरोक्रेट को भी समय निर्धारित कर वोट द्वारा रिप्रिजेंटेटिव बना ही बदलाव कर सकते हैं।

            भारत को वास्तविक डेमोक्रेटिक एवं विकसित राष्ट्र सभी वर्ग के नागरिकों को मेनस्ट्रीम में लाकर हीं बना सकते हैं। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो भारत सिर्फ कहने को तो डेमोक्रेटिक स्टेट रहेगा, पर वास्तव में ये थियोलॉजिकल स्टेट ही बना रहेगा।

सूर्य को फल समझकर निगल गये थे।

 हनुमान जी जब छोटे थे तो बचपन में सूर्य को फल समझकर निगल गये थे।


सूर्य से पृथ्वी की दूरी -149.6 million km.

149600000 km
ध्यान दीजियेगा,और ये मेसेज पढने वाले आप अपना दिमाग लगाकर सोचना।

श्री लंका से हिमालय की दूरी 2400km
और वापस आना जाना हो गया 4800km
जब हनुमान जी बडे थे तो एक रात में हिमालय से लंका तक पहाड उठा लाये थे तो इस हिसाब से उनके उडने की स्पीड हुयी  4800÷12=400km per hr

जब हनुमान जी बडे थे तो 400 km की स्पीड से उडते थे ये मान लिया जाये कि बच्चा बडों से कमजोर होता है तो बचपन में वो 300 km की स्पीड से उडते होंगे
तो सूर्य की दूरी तय करने में लगा  समय

149600000÷300=498666 घण्टे

498666÷24=20777दिन

20777÷365=57साल
एक तरफ से विज्ञान के मुताबिक लगे 57 साल और दोनों तरफ से लगे 114 साल।
अब यहाँ कुछ प्रश्न हैं मेर
प्रश्न नम्बर एक

*जब वो 114 साल बाद वापस आये तो हनुमान जी बच्चे ही थे या बडे हो गये थे ?*

प्रश्न 2- *जब हनुमान जी ने सूर्य खाया था तो अन्धेरा केवल भारत में हुआ था या पूरी पृथ्वी पर,अगर हाँ तो दूसरे देशों जैसे अमेरिका, जापान,ब्रिटेन में हनुमान जी को कोई क्यों नहीं जानता?*

प्रश्न-3 *जब 114 साल बाद वो वापस पृथ्वी पर लौटे तो सभी लोग उतने ही बडे थे या सबकी उम्र 114 साल बढ चुकी थी?*

2-4 प्रश्न आप खुद जोड लीजिये और हमारे देश को अन्धविश्वास से मुक्त कराने में सहायता कीजिये, क्योंकि अब हमारा देश शिक्षित हो रहा है झूट पकड लेता है ।


 भगवान से_सवाल
1:- क्या तुम कायर हो जो हमेशा छिपे रहते हो , कभी किसी के सामने नहीं आते ?
2:-क्या तुम खुशामद परस्त हो जो लोगो से दिन रात पुजा-अर्चना करवाते हो ?
3:- क्या तुम हमेशा भुखे रहते हो जो लोगो से मिठाई , दुध , घी आदी लेते रहते हो ?
4:- क्या तुम मांसाहारी हो जो लोगो से निर्बल पशुओं की बलि मांगते हो ?
5:- क्या तुम सोने के व्यापारी हो जो मंदिरो मे लाखों टन सोना दबाये बैठे हो ?
6::- क्या तुम व्याभिचारी हो जो मंदिरो मे देवदासिया रखते हो ?
7:- क्या तुम कमजोर हो जो हर रोज होने वाले बलात्कारो को नहीं रोक पाते ?
8:-क्या तुम मुर्ख हो जो जो विश्व के देशो मे गरीबी-भुखमरी होते हुए भी अरबो रूपयो का अन्न , दुध , घी , तेल बिना खाएे ही नदी नालो मे बहा देते हो ?
9:- क्या तुम बहरे हो जो बे वजह मरते हुए आदमी , बलात्कार होती हुयी मासुमो कि अवाज नही सुन पाते ?
10:- क्या तुम अंधे हो जो रोज अपराध होते हुए नही देख पाते ?
11:- क्या तुम आंतकवादी से मिले हुऐ हो जो रोज धर्म के नाम पर लाखों लोगो को मरवाते रहते हो ?
12:- क्या तुम आंतकवादी हो जो ये चाहते हो कि लोग तुम से डरकर रहें ?
13:- क्या तुम गुंगे हो जो एक शब्द नही बोल पाते लेकिन करोड़ो लोग तुमसे लाखो सवाल पुछते है ?

14:- क्या तुम भ्रष्टाचारी हो जो गरीबो को कभी कुछ नही देते जबकी गरीब पशुवत काम करके कमाये गये पैसे का कतरा-कतरा तुम्हारे ऊपर न्यौछावर कर देते है !


क्या सरस्वती ज्ञान की देवी है? अगर है तो इन
शंकाओं का समाधान करें.🌡

1.इसके बिना ईसाई, मुसलमान, प्रकृति पूजक,
नास्तिक आदि कैसे ज्ञान प्राप्त कर पा रहे हैं.🌡

2. सरस्वती कितनी भाषायें जानती है?🌡

3. हड़प्पा सभ्यता की लिपि अब तक नहीं पढ़ी
गई. इस संबंध में सरस्वती का क्या प्लान है?🌡

4. सरस्वती के होते हुए स्कूलों में शिक्षकों की
जरूरत क्यों पड़ती है?🌡
5. अंग्रेजों के पहले भारत में अंग्रेजी क्यों नहीं थी.
क्या सरस्वती पहले अंग्रेजी नहीं जानती थी?🌡

6. कई देश शत प्रतिशत साक्षर हो गए, जबकि
भारत सरस्वती के होते हुए भी साक्षरता में पीछे
है, क्यों?🌡

7. मनु ने मनुस्मृति में शूद्रों का पढ़ना दंडनीय
माना है. 🌡आज तक इस मामले में सरस्वती ने कोई
एक्शन क्यों नहीं लिया? 🌡
क्या सरस्वती भी इस
षड़यंत्र में शामिल थी?🌡 ज्ञान तो सरस्वती देती है.
क्या यह ज्ञान मनु को सरस्वती ने ही दिया था?🌡

8. कई भाषायें लुप्त हो गईं और कई लुप्त हो रही हैं.
सरस्वती उन्हें क्यों नहीं बचा पा रही हैं? 🌡क्या
इतनी सारी भाषाओं को याद रखना उनके लिए
मुश्किल है?🌡

9 .कुछ बच्चे मेहनत करने पर भी पढ़ाई में कमजोर
होते हैं, क्यों? 🌡क्या वह भेदभाव करती हैं?🌡

10. सरस्वती के होते हुए मटरगस्ती करने वाले, भ्रष्ट
लोग शिक्षक कैसे बन जाते हैं?🌡

11. वसंत पंचमी पर ब्राह्मण ही सरस्वती की पूजा
संपन्न करवाते हैं तथा सरस्वती की मूर्ति स्थापना
भी पंडित ही करते हैं. 🌡सरस्वती दूसरी जातियों से
पूजा क्यों नहीं करवाती है? 🌡क्या सरस्वती
भेदभाव करती हैं? या सरस्वती ब्राह्मण जाति की
हैं.🌡

12. हिंदुओं के अलावा बाकी धर्म के लोग सरस्वती
को क्यों नहीं पूजते? 🌡क्या यह हिंदुओं के द्वारा
कल्पित की गई हिंदुओं की ऐसी देवी है जो हिन्दू
हितों का ध्यान रखने के साथ हिंदू धर्म का प्रचार
करती हैं?🌡

13. कहीं इसके पीछे मुसलमानों को पिछड़ा बनाये
रखने की चाल तो नही है 🌡कि सरस्वती के कारण
मुसलमान अपने बच्चों को स्कूलों में भेजने से
कतराएंगे.🌡

14. सरस्वती महिला है फिर भी महिलओं की
साक्षरता दर बहुत कम है, क्यों?🌡

15. सरस्वती के होते हुए आम बच्चों के लिए
खस्ताहाल स्कूल और अमीरजादों के लिए
डीपीएस जैसे कोंवेन्ट स्कूल क्यों हैं? 🌡इस मामले में
सरस्वती जी ने आज तक कोई समुचित निर्णय क्यों
नहीं लिया —🌡


अब आप लोग ही सोचिये कि क्या सरस्वती नाम की कोई देवी है क्या?🌡

गुमराह OBC

*डॉ. बाबासाहब आंबेडकरजी की हत्या होने के कारण भारतिय लोकतंत्र मे सबसे बडा नुकसान OBC का हुआ!*
इसका मूलकारण बाबा साहब अम्बेडकर के बारे मे और OBC के लिए बाबा साहब अम्बेडकर के संघर्ष के बारे मे OBC को ब्राहम्णों ने जानकारी नहीं होने दी और ब्राहम्ण धर्म के जाल और उंच निच मे फंसा कर रखा

इसको मात्र एक सामान्य उदाहरण से समझा जा सकता है

ब्राहम्णों ने पिछडा वर्ग को शूद्र बनाया
शूद्र नामकरण किया
और शिक्षा सम्पत्ति और आत्मरक्षा के अधिकार से वंचित किया(गुलाम बनाया)

दूसरी तरफ़
बाबा साहब अम्बेडकर ने पिछडे वर्ग को OBC संवैधानिक नाम दिया

 उसके लिए संविधान मे आर्टिकल 340 लिखा
जिसके अन्दर उनको सामाजिक और शैक्षणिक पिछडेपन कि वजह से शासन प्रशासन मे अपनी जनसंख्या के अनुसार भागीदारी का अधिकार लिखा

इसी आर्टिकल 340 के अनुसार बाबा साहब के दबाव मे इनको काका कालेकर कमीशन बनाना पडा
परन्तु उसको लागू नहीं किया
बाबा साहब के परिनिर्वाण के बाद
इस कमिशन को लागू करनेवाले के बजाय ठंडे बस्ती मे डाल दिया

काका कालेलकर कमीशन की जगह ओबीसी नेताओं के दबाव मे मंडल कमीशन बनाया और उसको लागू नहीं किया

मान्यवर काशीराम जी ने इसको लागू कराने के लिए पुरे देशभर मे आंदोलन चलाया

वीपी सिंह को मंडल कमीशन लागू करना पडा

परन्तु इसमें भी फिर षड्यंत्र किया

1931 कि जनगणना के अनुसार ओबीसी 52% है तो आर्टिकल 340 के अनुसार जनसंख्या के अनुसार 52% शासन प्रशासन मे भागीदारी मिलनी चाहिए
परन्तु ओबीसी को इसका आधा 27% प्रतिनिधित्व दिया

उस आधे प्रतिनिधित्व मे भी कोर्ट के माध्यम से संविधान के विरोध मे क्रिमलेयर(आर्थिक आधार) लगाया
जबकि भारतिय संविधान मे आर्टिकल 340 ओबीसी को सामाजिक और शैक्षणिक पिछडेपन की वजह से शासन प्रशासन और शिक्षा मे जनसंख्या के अनुसार भागीदारी की बात करता है

तिसरा षड्यंत्र नौकरियों मे भागीदारी दी परन्तु शिक्षा मे लागू नहीं किया

फिर चौथा षड्यंत्र SC/ST कि तरह प्रमोशन मे भागीदारी नहीं दी तो ऊंचे पद जहां पर सिर्फ प्रमोशन से पहुचां जा सकता है
वहाँ ओबीसी का प्रतिनिधि नहीं पहुंचा और जहां देश कि नितियां बनती है
वहां नहीं गया और देश का निति निर्माता ब्राहम्ण ही बना और 
2017 आते आते ओबीसी की भागीदारी मात्र 2% कर दी जिसका उदाहरण नीट मेडिकल परीक्षा है

सुनिए लिंक पर जाकर बाबरी मस्जिद 6 दिसम्बर को क्यों गिराई गई।इसका मकसद बाबा साहब का परिनिर्वाण दिवस को धूमिल करना  नहीं बल्कि मंडल कमीशन को लागू करते समय ओबीसी को क्रिमलेयर(आर्थिक आधार)का षड्यंत्र ना पता हो
इसलिए 6 दिसम्बर को बाबरी मस्जिद गिराई गई
इतना भयंकर षड्यंत्र ओबीसी के साथ हुआ
परन्तु अभी भी ओबीसी इस षड्यंत्र को समझ कर अपने ही भाइयों का आंदोलन मे साथ देने को तैयार नहीं है
यही सबसे बडा दुर्भाग्य है
नहीं तो 52% ओबीसी आज लोकतंत्र मे बहुमत के आधार पर देश का शासक होता
https://youtu.be/CzcZoJmRLYI

कन्हैय्या कुमार की असलियत.


साथीयों,
कन्हैया कुमार झा यह बिहार का ब्राम्हण है | और वह ब्राह्मणों की कम्युनिष्ट पार्टी के SFI संघटन का जेएनयु यूनिवर्सिटी मे कार्य कर्ता भी है |

हमारे एससी, एसटी, ओबीसी लोगों को गुमराह करणे के लिए आजतक आरएसएस के द्वारा बहुत सारे आंदोलन चलाये थे |

१) अण्णा हजारे - अण्णा हजारे ने आरएसएस के कहने पर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाया | लेकिन वह आंदोलन भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन नही था | बल्की ओबीसी की जातिनिहाय गिणती रोखणे का आंदोलन था | यह आंदोलन चलाणे की वजह से कुछ दिनों के लिए मिडीया ने अण्णा हजारे को महत्मा गांधी बनाया था | लेकीन अण्णा हजारे यह ओबीसी होणे के कारण आज वह कहाँ है?

२) अरविंद केजरीवाल - अरविंद केजरीवाल ने आरएसएस के कहने पर ही अण्णा हजारे का साथ दिया था | उसने अण्णा हजारे ने बनाये हुये माहौल का पुरी तरह से इस्तेमाल करके अपनी खुद्द की पार्टी बनाई | उस वक्त मिडीया ने बडी चलाखी से अण्णा को दिखाना कम किया और कजरी को ही ज्यादा दिखाया | जिसका नतिजा यह हुआ की कजरी दिल्ली का मुख्यमंत्री बन गया | केजरीवाल बनिया होणे के कारण आज वह कहा है?

३) हार्दिक पटेल - हार्दिक पटेल ने भी पाटीदारो को आरक्षण मिलना चाहिए यह आंदोलन आरएसएस के कहने पर चलाया | मिडीया ने उसे बहोत बडा किया | लेकिन आज वह कहा है?

बिल्कुल वैसे ही डॉ. रोहित वेमुला कि हत्या का मुद्दा दबाने / दिशा बदलने / ध्यान हटाने / नजर हटाने / भटकाव मे चले जाने के लिए ही आरएसएस ने कन्हैय्या कुमार को बडा किया है |

यह बात मै दावे के साथ इसलिए कह रहा हुँ | क्योंकी आज तक जितने भी ब्राह्मण - बनियों की चैनल ने कन्हैय्या कुमार को लाईव दिखाया है | उन सबके मालिक बीजेपी / आरएसएस से मिले - जुले है | इसलिए कन्हैय्या कुमार आंदोलन भी अण्णा हजारे, अरविंद केजरीवाल, हार्दिक पटेल की तरह ही बाय प्रोडक्ट है |

डॉ. रोहित वेमुला की हत्या के बाद मैने निरंतर लोगों को देश मे चल रही माहौल की असलियत बताने काम किया है | मैने और कुछ कार्यकर्ताओं ने भी आज तक बहुत सारे सवाल भी उठाये थे | वही हमारे कुछ साथीयों के / मेरे सवाल और कुछ जानकारी को मै फिरसे दोहरणा चाहता हुँ |

१) डॉ. रोहित वेमुला की माताजी रोहित की हत्या हुयी यह बात हमेशा कहती है | हम सब भी जानते है की, उसकी हत्या ही हुयी है | फिर भी कन्हैय्या कुमार डॉ. रोहित वेमुला के हत्या को बार - बार आत्महत्या क्यों बोलता है?

२) कन्हैय्या कुमार नागपुर मे १४ एप्रिल को किसकी जयंती मनाने गया था? क्योंकी उसी दिन उसके संघटन के पूर्व मार्गदर्शक पी. सी. जोशी का भी जन्मदिन था | यदी वह बाबासाहब की ही जयंती मनाना चाहता था तो उसने अपने भाषण में ऐसा क्यों कहाँ की, आज जैसे बाबासाहब की जयंती है बिल्कुल वैसेही आज पी. सी. जोशी की भी जयंती है | तो सवाल यह निर्माण होता है की, उसने बाबासाहब कि जयंती दिन पर एक जोशी नामक ब्राह्मण को याद क्यो किया? आँखिर क्या कारण हो सकता है?

३) कन्हैय्या कुमार ने नागपुर में बाबासाहब की जयंती दिन पर ही ऐसा क्यों कहाँ की, राम हमारी कण कण में बसे है | और हम उनकी संतान है | क्या यह बनायेगे मंदिर का नारा देणेवाली बीजेपी और आरएसएस को खुश करणे जैसा नही है? १५ एप्रिल को रामनवमी आती है | यह जानते हुये भी उसने एक दिन पहले काळाराम मंदिर का सत्याग्रह करणेवाले / मंदिर को ताला लगाने वाले डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की जयंती दिन पर ही राम क्यों याद किया? क्या यह डॉ बाबासाहब आंबेडकर की बाविस प्रतिज्ञा के खिलाफ नही है? उसने बाबासाहब की राम के खिलाफ दि हुयी प्रतिज्ञा क्यों नही कही? आँखिर कौनसा कारण हो सकता है?

४) कन्हैय्या कुमार ने नागपुर दिये हुये भाषण मे ही बाबासाहब की जयंती दिन पर गांधी का समर्थन क्यों किया? क्या वजह हो सकती है?

५) कन्हैय्या कुमार नागपुर मे आरएसएस का मुख्यालय है यह बात जानते हुये भी उसने ऐसा क्यों कहाँ की, मैं आरएसएस का विरोधी नहीं हुँ | उनके सिद्धान्त के विरोध में हुँ | यह बात क्या दर्शाती है?

६) १४ अप्रैल बाबासाहब के जयंती दिन के अवसर पर ही डॉ. रोहित वेमुला कि माँ और भाई ने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी | मिडीया ने  उन्हे लाईव दिखाने के बजाये सिर्फ कन्हैय्या कुमार को ही लाईव दिखाया | आँखिर क्या कारण हो सकता है?

साथीयो,
ईस सवाल के जवाब मै कन्हैय्या कुमार का समर्थन करणे वाले लोगों से माँगणा चाहता हुँ |

जितने भी लोगों ने डॉ. रोहित वेमुला हत्या के बाद अपनी - अपनी तरीके से लिखा है | ऐसा नही है की, मै उन सभी दोस्तों की प्रतिक्रिया / राय / सुझाव से सेहमत नही हुँ | मै सेहमत हुँ | किंतु उन्हे भी मेरी बातों पर गौर से सोचना ही होगा |

देखना / याद रखना..! अब यह वक्त ही तय करेगा की, कन्हैय्या कुमार का आंदोलन कितना ईमानदार था? और है?

डॉ. रोहित वेमुला हो | चाहे मुझफ्फरनगर के पिडीत मुसलमान लोगों को न्याय दिलाने के लिए चला हुआ आंदोलन हो | ईस मुल इश्यू को आरएसएस के लोगो द्वारा रोहित वेमुला कि हत्या करकर उसके देशव्यापी इश्यू को नॉन इश्यू बनाकर कन्नैया कुमार के नॉन इश्यू को ब्राह्मणी मिडिया ने देशव्यापी इश्यू बनाया है | ईस बात पर भी हमे गंभीरता से सोचना ही होगा |

क्योंकी, यह सोचने का और सोचकर निर्णय लेणे का ही वक्त है | नही तो आपका इस्तेमाल होणा तय है |

इसलिए मै सवाल पुँछना चाहता हुँ उन लोगों से जो इश्यू को छोडकर नॉन इश्यू का समर्थन करते है | तो क्या ऐसा समर्थन गलत नही है?

देशव्यापी संघटन का नेतृत्व करना तो दूर कि बात है | यहा हमारे लोगों को इश्यू और नॉन इश्यू को पहचानना भी नही आ रहा है | अर्थात यह समजने के लिए दुरदृष्टी और तर्कबुध्दी की बहुत ही आवश्यकता है | जो की हमारे लोगों के पास नही है | यही हमारी सबसे बडी दुख की बात है |

आज तक का आरएसएस का इतिहास देखा जाये तो वह किसी भी इश्यू को नॉन इश्शू बनाकर समाज और देश भर में प्रचलित करते आये है | और हमारे लोग भी उनके षढयंत्र को फँसते ही गये है |

इसलिए जो लोग अपनी देश मे सामाजिक तथा समाज का कार्य करणा चाहते है ऐसे लोगों को देश और समाज का आकलन होणा जरुरी है | क्योंकी, जिसके पास ये आकलन नही होता वह शत्रू के षडयंत्र के झाँसें मे आकर अपनी खुद्द की तो खुद्दखुशी करता ही है, साथ में अपने समाज का भी सत्यानाश करता है.

कही कन्हैय्या कुमार का आंदोलन हमारे लोगों की खुद्दखुशी और सत्यानाश का कारण तो नही बन रहा है | अगर ऐसा है तो हमे सावधानी बरतकर डॉ. रोहित वेमुला की आंदोलन पर फिरसे वापस आणे की जरुरत है. ऐसा मेरा स्पष्ट रुप से कहना है.