Sunday, 26 November 2017

आरक्षण और गाँधी

 *आरक्षण और गाँधी*

सन 1930 में साइमन कमीशन भारत में आया था ! जिसका श्री मोहनदास करमचंद गांधी और गाँधी के इशारे पर उसके चेलों और चमचों ने कडा विरोध किया था ! श्री गाँधी एंड कम्पनी ने “गो-बैक साइमन कमीशन” का नारा दिया था ! *किन्तु श्री गाँधी और उसके चेलों की परवाह किये बगैर साइमन कमीशन ने भारत में रहने वाले विभिन्न प्रकार के अस्पर्श्य वर्गों का गहराई से सर्वेक्षण और अध्ययन किया !* साथ ही विभिन्न प्रकार के अस्पर्श्यों की गणना भी की थी और अपनी रिपोर्ट में भारत के अस्पर्श्यों की जनसँख्या उस समय चार करोड़ पैंतालिस लाख बताई गई थी !

बाद में इन सभी अस्प्रश्य वर्गों की एक सूची तैयार की गई ! जिसे 1935 में अधिनियम बनाकर “अनुसूचित जाति” नाम दिया गया ! साइमन कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार अस्प्रश्यों की *जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर ही अंग्रेजों से बाबा साहेब डॉ० भीमराव आंबेडकर कम्युनल अवार्ड के माध्यम से अस्प्रश्यों को प्रथक निर्वाचन और दो वोट देने का विशेष अधिकार प्राप्त करने में कामयाब हुए थे !*

किन्तु *सितम्बर 1932 में यरवदा जेल पर श्री मोहनदास करमचंद गाँधी द्वारा आमरण अनशन करने के कारण पूना-समझौता में अस्प्रश्यों का एक वोट का अधिकार छीन लिया गया !* पूना-समझौते के समय श्री गांधी ने सरकारी नौकरियों, शिक्षा, राजनीती और अन्य सभी क्षेत्रों में अछूतों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने का बाबा साहेब डॉ० भीमराव आंबेडकर से वादा किया था ! किन्तु बाबा साहेब को श्री गांधी की मानसिकता पर विश्वास नहीं था ! विषम परिस्थितियों में किये गए पूना-समझौते को तभी तो बाबा साहेब ने अपनी भूल कहा था !

आरक्षण के मामले में यदि पूरे देश के इतिहास पर नजर डाली जाये तो *24 सितम्बर 1932 को बाबा साहेब डॉ० भीमराव आंबेडकर और मोहनदास कर्मचंद गाँधी के बीच हुए पूना-समझौते (पूना-पैक्ट) से पूर्व सरकारी सेवाओं में दलितों का प्रतिनिधित्व नगण्य था ! जिसका मुख्य कारण शैक्षिक रूप से पिछड़ापन था ! यह सर्व विदित है कि अस्पर्श्य वर्गों का शैक्षिक रूप से पिछड़ेपन का सबसे बड़ा मुख्य कारण इन वर्गों के साथ सदियों से किया गया जातिभेद और छूआछूत का वर्ताव ही रहा है !*

1992-93 की राष्ट्रीय अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति आयोग की रिपोर्ट में जानकारी मिलती है कि *सन 1934 में पहली बार औपचारिक आरक्षण की घोषणा के बिना ही यह अनुदेश जारी किये गए थे, कि अपेक्षित योग्यता प्राप्त दलित वर्गों के उम्मीदवारों को नियुक्ति के उचित अवसरों से मात्र इसलिए वंचित नहीं किया जाना चाहिए कि वे खुली प्रतियोगिता में सफल नहीं हो सके ! इसके बाद इन अस्पर्श्य वर्गों को भारत सरकार अधिनियम 1935 में अनुसूचित जातियां नाम दिया गया !*

सर्वप्रथम 1943 में भारत सरकार ने खुली प्रतियोगिता के माध्यम से सीधी भर्ती वाले पदों में अनुसूचित जातियों के लिए 8.33 प्रतिशत आरक्षण का प्राविधान किया और आयु सीमा तथा परीक्षा शुल्क में छूट की भी घोषणा की गई !  1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अनुसूचित जातियों के लिए खुली प्रतियोगिता की सीधी भर्ती में 12.50 प्रतिशत तथा खुली प्रतियोगिता से भिन्न तरीके से भर्ती मामलो में 16.75 प्रतिशत की दर से आरक्षण का प्राविधान किया गया ! जबकि अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रथम बार 5.00 प्रतिशत आरक्षण का प्राविधान देश में संविधान लागू होने पर सन 1950 में ही किया गया !

दिनांक 25-03-1970 से अनुसूचित जाति का आरक्षण 12.50 प्रतिशत से बढाकर 15.00 प्रतिशत तथा अनुसूचित जनजाति का आरक्षण 5.00 प्रतिशत से बढाकर 7.50 प्रतिशत कर दिया गया था ! वर्तमान में देश के अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों की जनसँख्या का अनुपात बढ़ गया है, किन्तु आरक्षण पुरानी दर पर ही चला आ रहा है !

यहाँ हमने आरक्षण का इतिहास बताना इसलिए जरुरी समझा कि उपरोक्त इतिहास से यह स्पष्ट होता है कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की व्यवस्था, अस्पर्श्यों (अछूतों) को केवल आर्थिक मदद पहुंचाना नहीं है और *आरक्षण केवल गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम भी नहीं है ! बल्कि अछूतों को शासन-प्रशासन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देकर जातिभेद और छूआछूत के उन्मूलन का भी एक साधन है ! ताकि अछूतों को भी आत्मसम्मान प्राप्त करने के अवसर प्राप्त हो सके !*

यहाँ यह तत्थ रखना आवश्यक है कि प्रतियेक हिन्दू व्यक्ति किसी न किसी जाति में जन्म लेता है ! उसकी वह जाति ही उसके धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक जीवन का निर्धारण करती है ! हिन्दुओं में यह स्थिति माँ की गोद से लेकर‌‍‍‍‍ म्रत्यु की गोद तक तक रहती है ! *बाबा साहेब डॉ० आंबेडकर कहते है कि अस्पर्श्य लोग हिन्दू समाज के नही है और हिन्दू भी यह नहीं समझते हैं कि वे और अस्पर्श्य दोनों एक ही समाज के लोग हैं ! यही कारण है कि हिन्दुओं में नैतिक द्रष्टि से अस्पर्श्यों के प्रति कोई चिंता या ममत्व नहीं होता ! हिन्दू अपनी हठधर्मिता और अन्याय को गलत नहीं समझते ! उनका यह विवेक अभाव अस्प्रश्यता (छूआछूत) के निवारण के रास्ते में बहुत बड़ी बाधा है !*



 भारतीय संविधान के 2 भाग ऐसे हैं जिसका डाइरेक्ट कनेक्शन आम जनता को प्रभावित करता है उनमें से -
1. मौलिक अधिकार &
2. राज्य के नीति निदेशक तत्व
मौलिक हक का हनन होने पर माननीय न्यायालयों से न्याय की मांग की जाती है &
दूसरा सीधे सरकार से न्याय की गुहार लगाई जाती है
इसी लिए शायद डॉ. अम्बेडकर ने कहा है कि ," *यदि कोई सरकार इसकी उपेक्षा करती है, तो उन्हें निश्चित ही इसके लिए मतदाताओं के समक्ष उत्तरदायी होना पड़ेगा*"

*न्याय सबके लिए*
*************
विभिन्न पहलुओं को देखते हुए समझ में आता है कि न्याय किसी व्यक्ति विशेष का न होकर संविधान निर्माताओं ने सभी के लिए समान न्याय का प्रावधान किया है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39 A जो राज्य के नीति निदेशक तत्व में प्रावधान किया गया है ।
राज्य के नीति निदेशक तत्वों में अंतर्निहित उद्देश्य के सम्बन्ध में *डॉ. भीम राव अम्बेडकर* ने कहा कि , "  *ये भारतीय संविधान की अनोखी विशेषताएं हैं , इसमें लोक कल्याणकारी राज्य का लक्ष्य निहित है* ।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 39(क) के अनुसार - कानूनी सहायता प्राप्त करना किसी भी ऐसे व्यक्ति का अधिकार है जो कानूनी सहायता का पात्र है किंतु वह एक वकील की सेवा लेने में समर्थ नहीं है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 39(क) के अनुसार
समान न्याय और निःशुल्क विधिक व्यवस्था अर्थात -
कानूनी सहायता प्राप्त करना ।

न्याय के अवधारणा को समझने के लिए इसके विभिन्न आयामों को जानना होगा क्योंकि जीवन के विभिन्न पक्षों में न्याय का संदर्भ भिन्न है।  सुविधानुसार इसे हम विधिक, समाजिक, आर्थिक  एवं राजनीतिक आयामों के रूप में देख सकते हैं , लेकिन इसका उद्देष्य न्याय का पृथकता नही है क्योंकि न्याय एक संपूर्ण प्रत्यय है।

1. कानूनी या विधिक न्याय:-

विधिक न्याय का अर्थ है कि ’विधि के समक्ष’ प्रत्येक व्यक्ति समान है और प्रत्येक व्यक्ति को ’विधि का समान’ संरक्षण प्राप्त है   यह व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में अपनाया गया है।

 2. राजनीतिक न्याय

राजनीतिक न्याय का आशय ‘एक व्यक्ति एक मत’ से है जिसमें धर्म, लिंग, जाति, वर्ण व वर्ग आदि के आधार पर कोइ भेद न हो । राजनीतिक व्यवस्था में सभी को समान रूप से हिस्सा लेने का अवसर मिलना आवश्यक है।

3- सामाजिक न्याय:-

व्यक्तिगत व सामाजिक हितों की बीच सामाजस्य स्थापित करने का प्रयास है। सामाजिक न्याय का मुख्य आधार है कि व्यक्तिगत हित से अधिक सामाजिक हित महत्वपूर्ण होतें हैं। सामाजिक न्याय से आशय है कि समाज में जाति, वर्ण, लिंग, धर्म इत्यादि का भेद किये बिना सभी मनुष्यओ के प्रति समान दृष्टिकोण रखना आदि। अनुच्छेद 17, 18, नीति निर्देशक तत्व जैसे प्रावधान सामाजिक न्याय को अभिव्यक्ति करतें है। सामाजिक न्याय की स्थापना किसी समाज की अभीष्ट लक्ष्य होता है। यह प्रगतिशीलता का प्रतीक है क्योंकि यह सामाजिक परिवर्तन व सुधार में विश्वास व्यक्त करता है।


*विशालतम संविधान*

सर आइबर जेनिग्स ने भारतीय संविधान को " *विश्व का सबसे बड़ा और विस्तृत संविधान* " कहा है
*मूल संविधान में*
395 अनुच्छेद थे जो 22 भागों में विभाजित थे और 8 अनुसूचियाँ थीं ।
किन्तु *86th संविधान संशोधन अधिनियम 2000 के पश्चात संविधान में अब कुल 448 अनुच्छेद हो गए हैं जो 26 भागों में विभाजित हैं और उसमें 12 अनुसूचियाँ हैं*।
1950 से 2003 के दौरान 21 अनुच्छेदों को संविधान से निरस्त किया गया है, और 69 नये अनुच्छेदों को जोड़ा गया है जो निनमलिखित है :----- 39क, 43क, 48क, 51क, 134क, 139क, 144क, 224क, 233क, 239क, 239क क, 239क ख तक बारह, 243 A से 243 O तक पन्द्रह और 243 P
 से 243 ZG तक तेईस अर्थात कुल उनसठ।
*एक नया अनुच्छेद और जोड़ा गया 86th Amendment  2002 में अनुच्छेद 21A , जिसके अधीन शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया*

88th संविधान संशोधन, 2003 द्वारा अनुच्छेद 268क जोड़ा गया , 89th संविधान संशोधन 2003 द्वारा अनुच्छेद 338क और 91th संविधान संशोधन , 2004 द्वारा नया अनु. 361ख जोड़ा गया

पद्मावती और फूलन देवी

*पद्मावती और फूलन देवी*

जो भारत के सभ्य समाज के लोग रानी पद्मावती के अपमान पर भंसाली को पीट रहे थे, कभी वही समाज थियेटर मे फूलन देवी को नग्न देखकर ताली बजा रहा था।
जी हाँ जब शेखर कपूर ने फूलन देवी पर बैंडिट क्वीन (Bandit queen) फिल्म बनायी थी तो उसमे फूलन को कई बार नग्न दिखाया गया था। तब कोई सेना नही आई थी इसका बिरोध करने!!! क्या फूलन देवी महिला नही थी या किसी की बेटी नही थी।
पद्मावती ने अगर अपनी लाज बचाने के लिए जौहर (जलती आग मे कूद जाना) का साहस दिखाया था तो फूलन ने चण्डी का रूप धारण करके अपने आबरू के लुटेरो को मौत के घाट उतारा था। तब तो इन्ही के जाति मे से एक ने जाकर उसी वीरांगना की हत्या कर दी थी।
क्या सवर्ण समाज की नारियो का बस सम्मान ही सम्मान है। अगर अलाउद्दीन खिलजी नीच था तो वे लोग क्या थे जिन्होने फूलन देवी को बेआबरू किया था।
भारत का सवर्ण समाज अपने आपको कितना सभ्य संस्कारी एवं नारी का सम्मान करने वाला होने का दिखावा करता है। पर अंदर से कितना खोखला है। इनके लिए मान-मर्यादा इतिहास मे दर्ज हर वर्ग की महिला के लिए नही बल्कि एक वर्ग विशेष के महिला के लिए है

*राजपूतों को लेकर दिलीप मंडल की खतरनाक पोस्ट*

*क्ष* से *क्षत्रिय*.
यानी ब्राह्मण से नीचे की कटेगरी का वर्ण. ब्रह्मा के कंधे से उत्पत्ति.
जाति का कर्म- शस्त्र संचालन, युद्ध करना, और रक्षा करना.
हे क्षत्रियों,
इस देश में सब तरह के हमलावर आए. शक आए, हूण आए, मंगोल आए, गुलाम वंश वाले आए, तुर्क आए, अफगान आए, मुगल आए, फ्रांसिसी आए, पुर्तगीज आए, अंग्रेज आए.
तुम किससे लड़े भाई?
देश की रक्षा के लिए तुमने किया क्या? तुम्हारी तलवारें कर क्या रही थीं?
हथियार तो शास्त्रसम्मत तरीके से सिर्फ क्षत्रियों के पास थे. वे अपने काम में निकम्मे साबित हुए. हर हमलावर भारत में जीता.
क्षत्रियों ने किसी हमलावर को ज्यादा परेशान नहीं किया.
एक बात मान लो.
तुम्हारे पास एक ही काम था. ब्राह्मणों की लठैती का. उनके लिए तुम नीचे की जातियों को कंट्रोल करते थे. तुम्हारे हथियार इसी काम आए. तुम्हारी तलवारें कमजोरों के खिलाफ चलीं.
तुम्हारे लिए शौर्य का यही मतलब था.
देश की रक्षा जैसा कोई गौरव तुम्हारे पास कभी नहीं था. क्योंकि वह काम तुमने कभी किया ही नहीं.
ब्राह्मण ज्ञान के क्षेत्र में निकम्मे साबित हुए क्योकि एक बड़ी आबादी को हमेशा षड़यंत्रकारी ढंग से दूर रखा और इनका खुद का काम रहा काल्पनिक कथाओ और गप्पबाजी करके अनपढ़ो को आस्था और डर दिखाकर उल्लू बनाये रखना ताकि इनकी धर्म की दूकान चलती रहे और इनकी परजीवी पीढ़ियो का पेट यूं ही पलता रहे
और क्षत्रिय रक्षा के क्षेत्र में हजारों सालो की गुलामी का रिकॉर्ड बनाते रहे...
मैं ब्राह्मणों को ज्यादा दोषी इसलिए मानता हूं क्योंकि जाति बनाई ब्राह्मणों ने है.
भारत को ब्राह्मणों ने बीमार बनाया है....और बीमारी फैलाने का सारा श्रेय इन्ही आन बान शान वालो को समर्पित
जिसके कारण अब भारत में सब बीमार हैं...हर जाति को अपने नीचे जातियां दिखती हैं, वे उस पर जुल्म करते हैं. नीचे की जातियां भी बराबर बीमार हैं...
***

राजपूतों की बहादुरी का कोई जवाब नहीं था साहेब. अंग्रेजों ने देखते ही पहचान लिया था. तो साहेब हुआ यह कि जब अंग्रेजों को लगा कि इतने बड़े भारत पर सिर्फ गोरे सिपाहियों के बूते राज करना नहीं हो पाएगा. तो उन्होंने देश पर नजर दौड़ाई. सबसे बहादुर और सबसे वफादार और अंग्रेजों की सेवा करने के लिए उपलब्ध बिरादरियों की तलाश शुरू हुई.
जाहिर है राजपूतों पर अंग्रेज साहेबों की नजर सबसे पहले इनायत हुई.
मतलब आप समझ रहे हैं कि कितने बहादुर होंगे राजपूत.
1778 में राजपूतों की पहली बटालियन अंग्रजों की फौज में शामिल हो गई और देश भर में अंग्रेजों का राज स्थापित करने में लग गई. उस समय इन टुकड़ियों में हिंदू जातियों में से सिर्फ राजपूतों को रखा जाता था.
1778 तक मुख्य रूप से सिर्फ बंगाल ही अंग्रेजों के कब्जे में था. बाकी देश को कब्जे में लेने के लिए अंग्रेज फौज सजा रहे थे और राजपूत इस फौज में शामिल होने वालों में सबसे आगे थे.
राजपूतों ने अपने खूब जलवे दिखाए. सबसे पहले उन्होंने टीपू सुल्तान के बाप हैदर अली के खिलाफ तमिलनाडु के कड्डलोर में लड़ाई लड़ी. इन बहादुरों ने हैजरी अली से कड्डलोर छीनकर उसे अंग्रेजों के हवाले कर दिया.
1803 में उन्होंने दिल्ली पर धावा बोला और मराठों को दिल्ली से भगाकर दिल्ली अंग्रेजों के हवाले कर दी.
फिर 1805 में वे जाट राजा के होश ठिकाने लगाने भरतपुर पहुंचे और अंग्रेजों की ओर से जाटों को सबक सिखाया.
फिर वे एंग्लो सिख युद्धों में सिखों के खिलाफ लड़े और आखिरकार सिखों को भी हराया.

1857 की लड़ाई में सिख टुकड़ियों ने बागियों के होश ठिकाने लगा दिए. दिल्ली और अवध की लड़ाई इन्होंने ही अंग्रेजों के लिए जीतीं.
उसके बाद भी…मतलब क्या बताएं किस्से इनकी बहादुरी के. पूरा गौरवशाली अध्याय है.
अंग्रेजों ने भी इनकी झोली खाली नहीं रहने दी.
बहादुरों का अंग्रेज बहुत सम्मान करते थे. दिल्ली में तमाम राजपूत राजाओं के शानदार महल यूं ही नहीं बने.
**
दिल्ली में इंडिया गेट के आसपास आपने ढेर सारे भवन और हाउस देखे होंगे. उनमें सबसे ज्यादा हाउस आन-बान और शान वालों के हैं. जैसे धौलपुर हाउस, बीकानेर हाउस, जयपुर हाउस, कोटा हाउस, जोधपुर हाउस, अलवर हाउस, बाड़मेर हाउस, जैसलमेर हाउस वगैरह, वगैरह. मतलब कि जितने राजा उतने हाउस..
अंग्रेजों ने अपनी राजधानी में ये हाउस बनवाए थे. जो भी अंग्रेजों की गुलामी करने को तैयार हुआ उसके हाउस हैं. जो लड़े उनके हाउस नहीं हैं.
टीपू के वंशजों का हाउस नहीं है. झांसी हाउस भी नहीं है. अवध हाउस नहीं है.
जिनके हाउस बने, उनके लिए जरूरी था कि वे दिल्ली बुलाए जाने पर आएं. वहां ठहरें और परिवार को वहां रखें. बाकी कुछ बताने की जरूरत नहीं है.
तो इतनी ज्यादा आन-बान और शान थी ठाकुर साहबों की...
*d c mandal

मुग़ल-राजपूत वैवाहिक संबंधों पर एक नजर।                - 
जनवरी 1562- 
राजा भारमल की बेटी से अकबर की शादी (कछवाहा-अंबेर)
- 15 नवंबर 1570- 
राय कल्याण सिंह की भतीजी से अकबर की शादी (राठौर-बीकानेर)
- 1570- 
मालदेव की बेटी रुक्मावती का अकबर से विवाह (राठौर-जोधपुर)

- 1573 - 
नगरकोट के राजा जयचंद की बेटी से अकबर की शादी (नगरकोट)
- मार्च 1577- 
डूंगरपुर के रावल की बेटी से अकबर का विवाह (गहलोत-डूंगरपुर)
- 1581- 
केशवदास की बेटी की अकबर से शादी (राठौर-मोरता)

- 16 फरवरी, 1584- 
भगवंत दास की बेटी से राजकुमार सलीम (जहांगीर) की शादी (कछवाहा-आंबेर)
- 1587- 
जोधपुर के मोटा राजा की बेटी से जहांगीर का विवाह (राठौर-जोधपुर)
- 2 अक्टूबर 1595- 
रायमल की बेटी से अकबर के बेटे दानियाल का विवाह (राठौर-जोधपुर)

- 28 मई 1608- 
राजा जगत सिंह की बेटी से जहांगीर की शादी (कछवाहा-आंबेर)
- 1 फरवरी, 1609- 
रामचंद्र बुंदेला की बेटी से जहांगीर का विवाह (बुंदेला, ओरछा)
- अप्रैल 1624- 
राजा गजसिंह की बहन से जहांगीर के बेटे राजकुमार परवेज की शादी (राठौर-जोधपुर)


- 1654- 
राजा अमर सिंह की बेटी से दाराशिकोह के बेटे सुलेमान की शादी (राठौर-नागौर)
- 17 नवंबर 1661-
 किशनगढ़ के राजा रूपसिंह राठौर की बेटी से औरंगज़ेब के बेटे मो. मुअज़्ज़म की शादी (राठौर-किशनगढ़)
- 5 जुलाई 1678- 
राजा जयसिंह के बेटे कीरत सिंह की बेटी से औरंगज़ेब के बेटे मो. आज़म की शादी (कछवाहा-आंबेर)
- 30 जुलाई 1681- 
अमरचंद की बेटी औरंगज़ेब के बेटे कामबख्श की शादी (शेखावत-मनोहरपुर)

कई राजपूत बच्चों ने पाई गद्दी
1587 में 
जहांगीर और मोटा राजा की बेटी जगत गोसांई की शादी हुई, जिससे 5 जनवरी 1592 
को लाहौर में शाहजहां पैदा हुआ. अकबर ने जन्म के छठे दिन खुशी में उसका नाम खुर्रम (खुशी) रखा. जहांगीर की पत्नी नूरजहां का काफ़ी ज़िक्र होता है पर शेर के हमले से उन्हें असल में उनकी राजपूत बीवी जगत गोसांईं ने ही बचाया था. तुज़ुक-ए-जहांगीरी के मुताबिक़ उन्होंने पिस्तौल भरकर शेर पर चलाई, जिसके बाद जहांगीर की जान बची. नूरजहां ने इसके बाद ख़ुद शिकार करना सीखा.

यानी शाहजहां के बेटे औरंगज़ेब की दादी एक राजपूत थी. ग़ौरतलब यह भी है कि मुग़लों और राजपूतों के बीच शादियां औरंगज़ेब के समय भी जारी रहीं. ख़ुद औरंगज़ेब की दो पत्नियां हिंदू थीं. और उनसे पैदा हुए बच्चे कई बार बाक़ायदा उत्तराधिकार की जंग में जीते.


‘मुग़लों को मुसलमान कहना ही ग़लत’
क्लीनिकल इम्यूनोलॉजिस्ट डॉ. स्कंद शुक्ला कहते हैं कि मुग़ल बादशाहों और राजपूत रानियों से पैदा होने वाली संतानें दरअसल आधी राजपूत होंगी. उनका कहना है कि जेनेटिक्स के मुताबिक़ संतान में आधे गुण यानी 23 क्रोमोसोम पिता से और 23 क्रोमोसोम मां से आते हैं. चूंकि मुग़लों के परिवार पितृसत्तात्मक थे इसलिए उन्हें मुग़ल माना गया मगर जैविक तौर पर वो आधे भारतीय हो चुके थे. यही नहीं, डॉ स्कंद कहते हैं कि अगर इस तरह की शादियां लगातार जारी रहती हैं तो अगली पीढ़ियां पिछले गुणों को खो देती हैं. वह कहते हैं कि मेडिकल साइंस के नज़रिए से बाद की पीढ़ियों में राजपूती गुण ज़्यादा और विदेशी मूल के गुण कम हो गए होंगे.

राजपूतों की बेटियों का असर
राजपूतों की बेटियां सिर्फ हरम तक सीमित नहीं थीं. वो बादशाहों के फैसले प्रभावित करतीं थीं. बदायूंनी लिखता है कि अकबर ने अपनी हिंदू पत्नियों के कहने पर बीफ़, लहसुन-प्याज़ खाना छोड़ दिया था. 1604 में हमीदा बानो बेग़म की मौत के बाद अकबर ने सिर मुंडवाया था, क्योंकि यह हिंदू रानी की इच्छा थी. 
1627 में शाहजहां की राठौर पत्नी जोधपुर में 8 दिन सिर्फ़ इसलिए रुकी ताकि वह अपने पति शाहजहां के लिए ज़रूरी समर्थन जुटा सके. 
1605 में जहांगीर ने अपनी हिंदू पत्नी की मौत के ग़म में 4 दिन खाना नहीं खाया. तुज़ुक-ए-जहांगीरी में इसका तफ़सील से ज़िक्र है.

मुग़ल फ़ौज में सिर्फ़ मुसलमान नहीं थे

मुग़ल ताक़त को खड़ा करने वाले विदेशी मूल के नहीं बल्कि पूरी तरह भारतीय और अपनी बहादुरी के लिए मशहूर राजपूत, जाट और पठान थे. बर्नियर बताते हैं कि मुग़ल फ़ौज में राजपूत, पठान, ईरानी, तुर्क और उज़्बेक शामिल थे और इनमें जो गोरा यानी सफ़ेद रंग का होता था तो उसे मुग़ल मान लिया जाता था. मुग़ल सेना में पैदल, घुड़सवार और तोपखाना तीनों में कुल का 80 फ़ीसदी से ज़्यादा राजपूत, जाट और पठान होते थे और बाक़ी विदेशी मूल के सैनिक.

यही नहीं सेना में मनसबदारों को पैदल और सवार जाट, राजपूत या पठान मिलते थे. मिसाल के लिए बादशाह की ओर से इक हज़ारी की पदवी का मतलब था उस मनसबदार को 1000/1000 यानी एक हज़ार पैदल जाट और एक हज़ार घुड़सवार सेना रखने का हक़ था. अतहर अली ने अलग-अलग बादशाहों के दौर में मनसबदारों की स्थिति को बखूबी इसे बयान किया है-

Mansabdaar3
मुगलों की सेना मूलत: राजपूतों, जाटों और पठानों से मिलकर बनती थी.

इसे देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि चार बड़े मुग़ल बादशाहों के वक़्त राजपूत, दूसरे हिंदुओं और भारतीय मुस्लिम मनसबदारों की साझेदारी तक़रीबन आधी थी. ध्यान रहे कि ये सिर्फ़ ओहदेदार थे. इनकी सेना मूलत: राजपूतों, जाटों और पठानों से मिलकर बनती थी. चौंकाने वाली बात यह है कि औरंगज़ेब के समय न सिर्फ़ राजपूत मनसबदार बल्कि मराठा मनसबदारों की संख्या दूसरे मुग़ल बादशाहों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा थी. काबुल, कांधार, बर्मा और तिब्बत तक साम्राज्य के विस्तार के लिए अगर मुग़लों को किसी पर सबसे ज़्यादा यक़ीन था तो वो थे- राजपूत.

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औरंगजेब की फौज में सबसे ज्यादा मनसबदार थे.

औरंगजेब ने जब शिवाजी को रोकने को भेजा राजपूत रिश्तेदार
जब शिवाजी को रोकने की औरंगज़ेब की सारी कोशिशें नाकाम हो गईं तो उस वक़्त के सबसे बड़े मनसबदार और अपने समधी मिर्ज़ा राजा जय सिंह को उसने दक्कन भेजा. जय सिंह ने एक के बाद एक क़िले जीतकर शिवाजी को पीछे हटने को मजबूर किया. जदुनाथ सरकार ‘शिवाजी एंड हिज़ टाइम्स’ में लिखते हैं कि कैसे जयसिंह ने 11 जून 1665 को पालकी में इंतज़ार कर रहे शिवाजी से सिर्फ इसी शर्त पर मिलना स्वीकार किया कि वह शिवाजी की कोई शर्त नहीं मानेंगे और उन्हें अपने सारे क़िले बिना शर्त मुग़लों को सौंपने होंगे. शिवाजी ने शर्त मानी और औरंगज़ेब के दरबार में आने को मजबूर हुए.

जय सिंह का ओहदा इतना बड़ा था कि उनके कहने पर औरंगज़ेब ने दाराशिकोह का पक्ष लेने वाले राजा जसवंत सिंह तक को माफ़ कर दिया था और उसकी मनसबदारी भी बरकरार रखी थी.

राजकुमार शाह शुजा जब आगरा के तख़्त के लिए बढ़ा, तो उसे रोकने के लिए शाहजहां ने राजकुमार सुलेमान शिकोह के साथ राजा जय सिंह और अनिरुद्ध गौड़ को भेजा. बड़ी ताताद में राजपूतों ने तख़्त की लड़ाई में औरंगज़ेब का साथ दिया. इनमें शुभ करन बुंदेला, भागवत सिंह हाड़ा, मनोहर दास हाड़ा, राजा सारंगम और रघुनाथ राठौर प्रमुख थे. ज़्यादातर राजपूत राजाओं ने तख्त की लड़ाई में शाहजहां और उसके बड़े बेटे दाराशिकोह का विरोध किया था.

मुग़ल शासन का हिस्सा रहे राजपूत राजाओं ने कई शहर बसाए और मंदिर बनवाए. मसलन, राजा मानसिंह ने बंगाल में राजमहल नगर, राव करन सिंह ने दक्कन में करनपुरा और रामदास कछवाहा और राम मनोहर ने पंजाब में बाग़ बनवाए. मान सिंह ने उड़ीसा में और बीर सिंह बुंदेला ने मथुरा में मंदिर बनवाया. राव करन सिंह ने नासिक के मंदिरों को भारी दान दिया. और ये सभी मुग़ल प्रशासन का हिस्सा थे.

ऐसे में अगर मुग़ल का मतलब सिर्फ़ विदेशी आक्रमणकारी मुसलमान है तो यह हास्यास्पद तो है ही, सही भी नहीं लगता. भारत में आक्रमणकारी के तौर पर वो आए तो थे मगर वो अगर टिके तो शायद इसलिए क्योंकि उन्होंने बग़ैर किसी हिचक के उस वक़्त यहां की ताक़तों से हाथ मिलाया, उनसे गहरे पारिवारिक रिश्ते निभाए. हालांकि इसके चलते वो अपनी पहचान खोकर यहीं घुलमिल गए.

Saturday, 28 October 2017

ब्राह्मणवाद का क्या अर्थ है ?

एक भाई ने मुझसे पूछा है " ब्राह्मणवाद का क्या अर्थ है ? मैं भी ब्राहमण हूँ इसलिये जानना चाहता हूँ ? "उस भाई की जिज्ञासा के प्रश्न का उत्तर अपनी समझ से देने की कोशिश कर रहा हूँ ၊भारत का समाज जातियों में बंटा हुआ समाज है ၊भारत में जाति व्यवस्था ने आबादी के बड़े हिस्से को हीन और नीच घोषित किया ,मनु द्वारा घोषित नियम के अनुसार इस नीच घोषित किये गये आबादी के हिस्से की ज़मीने छीन ली गईं ,आबादी के इस हिस्से पर धन कमाने की मनाही थोपी गई,आबादी के इस हिस्से को राजनैतिक तौर पर कमज़ोर रखा गया ၊यानी आज के दलितो को एक घोषित विधान के अनुसार गरीब , कमज़ोर और नीचा बनाया गया ၊आबादी के बड़े हिस्से को नीच घोषित करने का काम किया सनातन धर्म ने ၊सनातन धर्म का विधान बनाया वेद, शास्त्र और पुराण लिखने वाले ब्राह्मणों ने,तो जाति प्रथा का निर्माण किया ब्राह्मणों ने,तो ब्राह्मणवाद यानि जाति प्रथा,आज भी ब्राह्मणों द्वारा रचित सनातन धर्म को ही बढ़ाया जा रहा है,भारत की राजनीति भी सनातन धर्म के प्रतीकों की रक्षा के नाम पर चल रही है,राम मन्दिर, भारतीय संस्कृति, जो असल में ब्राहमणवादी संस्कृति है, की रक्षा का संकल्प के नाम पर चुनाव जीते जा रहे हैं ၊इसलिये आज शूद्र और दलित जातियाँ कहती हैं कि उनकी लड़ाई ब्राह्मण वाद के विरुद्ध है,अर्थात ब्राह्मणों द्वारा जिन करोड़ों लोगों को नीच, हीन और गरीब बनाया गया,वह खुद को हीन घोषित करने वाले नियम और वाद से मुक्ति चाहते हैं ၊तो यह बिल्कुल जायज़ बात है ၊खुद को बुरी स्थिति मे ले जाने वाली व्यवस्था से विद्रोह करना और उस व्यवस्था का नाश करना,हर मनुष्य का नैसर्गिक कर्तव्य है ,इसलिये करोड़ों इंसानों को बुरी स्थिति में धकेलने वाले ब्राह्मणवादी कानूनों का नाश करने की कोशिश करना,हर न्यायप्रिय व्यक्ति का कर्तव्य होना चाहिये,इसलिये अगर आज कोई व्यक्ति ब्राहमणवाद का समर्थन करता है तो इसका अर्थ है वह करोड़ों लोगों को नीच घोषित करने को सही कह रहा है ၊और यदि आज के दौर मे कोई करोड़ों लोगों को नीच घोषित करने का समर्थन कर रहा है,तो वह लोकतन्त्र, संविधान, कानून, नैतिकता और इंसानियत के विरुद्ध बात कर रहा है ၊इसके अलावा भारत मे ब्राह्मणों द्वारा पूर्व में नीच घोषित किये गये करोड़ों लोग आज भी व्यापार, प्रशासन, शासन, न्यायिक सेवा, विश्वविद्यालयों के उच्च पदों पर आरक्षण के बावजूद नहीं पहुंच पा रहे हैं,इसका यह कारण नहीं है कि यह दलित योग्य नहीं है,बल्कि इसका कारण यह है कि सैंकड़ों सालों से ऊंचे पदों पर कब्ज़ा किये बैठे ताकतवर ब्राह्मणों का वर्ग इन दलितों से आज भी नफरत करता है,और इन दलितों को इन पदों से दूर रखने की कोशिशें करता रहता है ၊इस तरह दलित युवा मानता है कि उसे हीन हालात से निकलने देने में ब्राह्मणवाद और ब्राह्मण वर्ग बाधा है,देश मे सामाजिक न्याय के पक्षधर भी मानते हैं कि ब्राह्मणवाद द्वारा रचित जातिवाद एक न्याय युक्त समाज बनाने मे बाधा है,इसलिये सभी न्यायप्रिय लोग ब्राह्मणवाद के खात्मे के पक्ष मे हैं,इसके अलावा ब्राह्मणवाद द्वारा निर्मित जातिवाद चूंकि यह मानता है कि जाति जन्म से मिलती है,और जाति कभी बदल नहीं सकती,ब्राह्मणवाद मानता है व्यक्ति जिस जाति मे जन्म लेता है , वह उसी जाति मे मरता है,इसलिये ब्राह्मणवाद के नाश का अर्थ है जाति को जन्म से जोड़ने वाले धर्म का नाश ,इसलिये जो ब्राहमण जाति के व्यक्ति जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवाद के नाश के द्वारा सामाजिक न्याय के लिये कोशिश कर रहे हैं,ऐसे लोगों को ब्राहमण मान कर उनसे नफरत करना भी ब्राह्मणवाद है,ज्ञान को श्रम से श्रेष्ठ मानना ब्राह्मणवाद है,यह मानना कि शरीर से श्रम करने वाला हीन होता है,और बुद्धि से काम करने वाला उच्च होता है, यह भी ब्राह्मणवाद है ၊यह मानना कि अंग्रेजी जानने वाले, ऊँची शिक्षा पा गये लोग, शहरों में रहने वाले लोग श्रेष्ठ हैं,यह मानना कि अंग्रेज़ी ना जानने वाले, ऊंची शिक्षा ना पा सके लोग, गांव के लोग हीन है, भी ब्राहमणवाद है,ब्राह्मण जाति के अलावा, अन्य जाति मे पैदा होने के बावजूद इंसानों को जन्म के स्थान, शिक्षा और आर्थिक स्थिति के आधार पर हीन या श्रेष्ठ मानने वाला व्यक्ति भी ब्राहमणवादी है ၊भारत का सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक बदलाव ब्राह्मणवाद के नाश के बिना संभव ही नहीं है ၊

हिंदू धर्म के विरोध मे लिखोगे तो मरोगे

*हिंदू धर्म मे रहकर हिंदू धर्म के विरोध मे लिखोगे तो मरोगे |*
                   -✍🏻 हर्षवर्धन ढोके 

       आदमी के साथ विचारो की हत्या का ये सिलसिला *तुकाराम महाराज* के पहले से शुरु है; जो आज तक बना हुवा है | हिंदू धर्म मे रहकर हिंदू धर्म के खिलाफ जानेवालो को मौत के घाट उतारा जा रहा है | ब्राम्हणवाद के खिलाफ  लिखने पर तुकाराम महाराज को जिस तरह मौत के घात उतारा उसी तरह वर्तमान परिस्थिती मे *दाभोलकर,पानसरे, कुलबर्गी और अभी गौरी लंकेश* को मौत के घाट उतार दिया गया |

         हिंदू धर्म ये वर्णव्यवस्था, जात के आधार स्तंभ पर खडा है | हिंदू धर्म मे वर्ण और जात का यह आयाम आदमी मे रिड की हड्डी की तरह है | यदी ये रिड की हड्डी तुट जाये तो जिस तरह आदमी खडा नही हो सकता उसी तरह हिंदू धर्म से यदी वर्ण और जात नष्ट की जाये तो हिंदू धर्म नष्ट हो जायेगा | और RSS ये कभी नही होने देंगी | क्योकी उनकी सभी दुकानदारी इन्ही वर्ण और जात के आधार पर आधारीत है | 

हिंदू धर्म का जो भी सुधारक इस वर्ण व्यवस्था को चॅलेंज देगा उसे उसी हिंदू धर्म के आंतकियो द्वारा मौत के घाट उतारा जायेगा | यही RSS की संहिता है | RSS किसी भी द्वारा उनके उद्देशो के आड आने वाले को छोडेंगे नही | मौत के घाट उतारने के बाद दाभोलकर,नेमार्डे, पानसरे, कुलबर्गी फॅमीली के किसी भी सदस्य ने कोर्ट मे इस षडयंत्र के पिछे कौन है ! इसकी याचीका दाखल करके न्यायपालिका मे न्याय की गुहार नही लगायी | ऐसा क्यु ?? क्योकी RSS ने इन फॅमीलो को भी चुप कर लिया है | यदी इनकी फॅमीली ज्यादा कुदेगी तो उन्ही के साथ भी शायद ऐसाही कुछ होगा | जहा प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारे मिलते है ; वहा इन सामान्य लोगो के हत्यारो का एक भी सबूत (क्लू) नही मिलता ये सोचनी वाली बात है | जांच के सभी दरवाजे उपर से निचे तक बंद करवा दिये जाते है | इससे जुडे हुये मंत्री से लेकर निचली पोलीस स्टेशन तर हर जांच शिथील की जाती है | रोंक लगा दी जाती है | जो कुछ दिखता है वो सिर्फ दिखावा होता है | 

चलो जहा सरकार नही वहा लोग रस्ते पे उतरे तो ऐसा भी नही है | कोई भी हिंदुत्ववादी संघटना इन लोगो के मौत के कारण रस्तेपर निषेध आंदोलन लेकर उतरी नही | सभी हिंदू भाईयोने  इनके मौत पर शोक व्यक्त किया मगर इस शोक को लेकर रस्तेपर कॅंडल लेके खडे नही हुये | क्योकी उन्हे भी पता है इनकी हत्या करने वाले उन्ही के हिंदू धर्मीय ही है | हत्यारा यदी कोई गैर मुस्लीम, बौद्ध,ख्रिश्चन होता तो ये लोग हंगामा खडा कर देते | किसी भी हिंदू सांसद ने इस हत्या के खिलाफ संसद मे हंगामा खडा किया नही | *ये सभी बाते प्लॅनींग से चलती है |* होता इस तरह से है ; कोई हिंदू समाज सुधारक लिखता या बोलता है तो उसे हिंदूही द्वारा मारा जाता है | इसिलिये कोई भी हिंदुत्ववादी संघटना इसका निषेध नही करती | दातो तले जबान आ जाये तो ये दर्द बताये भी तो किसे ? 

पत्रकार गौरी लंकेश ने एक सप्ताह पहले RSS के कुछ राज खोले थे | अब्रू नुकसान मे गौरी शंकर के खिलाप भाजपा के ही कुछ मंत्री कोर्ट मे गये थे | गौरी उन्ही के पत्रिका मे हरदम हिंदूत्व के विरोध मे लिखते थे | आज उनकी भी गोली मारकर हत्या हुयी | उसकी भी कोई जाच नही होगी और जिन्होने उन्हे गोलीया मारी वो भी नही पकडे जायेंगे | ना ही गौरी लंकेश की फॅमीली इसके खिलाप कोर्ट मे जायेंगे ! 

इन तिन - चार लोगो की हत्या गोली मारकर हुयी है | ये बात विशेष ! एक तो बात तय है की, जो भी ब्राम्हणवाद के खिलाफ जायेगा उसे उसी शुटर गॅंग से मार दिया जायेगा | 

हिंदू धर्म मे रहकर हिंदू धर्म के विरोध मे बोलोगे,लिखोगे तो मरोगे | जिन्हे अपनी कलम से क्रांती करनी उन्होने पहले हिंदू धर्म को छोडकर बौद्ध धर्म स्विकार करके हिंदुत्व के खिलाफ लिखे | उससे धार्मिक संरक्षण प्राप्त होता है | किसी अन्य धर्म के विद्रोही लेखक के खिलाप जाने की RSS की हिम्मत नही होती | 
बात चाहे कुछ भी हो; जहा इंसानियत की बात सामने आती है; वहा ना धर्म देखा जाता ना जात | इन सभी हत्या का THE REPUBLICAN निषेध करती है | 

*हर्षवर्धन ढोके* 
THE REPUBLICAN 
6/9/17

महिला क्रांति के मसीहा

:भारतीय महिला क्रांति के मसीहा थे
 '‘विश्वरत्न डाँ.बाबासाहेब आंबेडकर’'
डाँ. बाबासाहेब आंबेडकर यह बात समझते थे कि स्त्रियों की स्थिति सिर्फ ऊपर से उपदेश देकर नहीं सुधरने वाली, उसके लिए क़ानूनी व्यवस्था करनी होगी। इस संदर्भ में महाराष्ट्रीयन बहुजन लेखक बाबुराव बागुल कहते है, ‘हिंदू कोड बिल" महिला सशक्तिकरण का असली आविष्कार है। इसी कारण बाबासाहेब डाँ. भिमराव आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल अस्तित्व में लाया जिसकी प्रस्तुति के बिंदु निम्न थे –
• यह बिल हिंदू स्त्रियों की उन्नति के लिए प्रस्तुत किया गया था ।
• इस बिल में स्त्रियों को तलाक लेने का अधिकार था ।
• तलाक मिलने पर गुज़ारा भत्ता मिलने का अधिकार था ।
• एक पत्नी के होते हुए दूसरी शादी न करने का प्रावधान किया गया था ।
• गोद लेने का अधिकार था ।
• बाप-दादा की संपत्ति में हिस्से का अधिकार था।
• स्त्रियों को अपनी कमाई पर अधिकार दिया गया था ।
• लड़की को उत्तराधिकार का अधिकार था ।
• अंतरजातीय विवाह करने का अधिकार था ।
• अपना उत्तराधिकारी निश्चित करने की स्वतंत्रता थी ।
इन सभी बिंदुओं के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि ‘हिंदू कोड बिल’ भारतीय महिलाओं के लिए सभी मर्ज़ की दवा थी । क्योंकि बाबासाहेब आंबेडकर समझते थे कि असल में समाज की मानसिक सोच जब तक नहीं बदलेगी तब तक व्यावहारिक सोच विकसित नहीं हो सकेगी। पर अफ़सोस यह बिल संसद में पारित नहीं हो पाया और इसी कारण आंबेडकर ने विधि मंत्री पद का इस्तीफ़ा दे दिया । इस आधार पर बाबासाहेब आंबेडकर को भारतीय महिला क्रांति का ‘मसीहा’ कहना कहीं से भी अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा ।
‘समाज की जटिलताओं को नज़रअंदाज़ करना गुलामी की नई बेड़ियाँ गाड़ने जैसा है’
बाबासाहेब आंबेडकर के अवलोकन में स्त्री-प्रश्न भारत में किसी भी दूसरे विकसित या पिछड़े मुल्क की तुलना में अधिक जटिल था। यह जटिलता परिवार, समाज, संस्कृति, कानून, रोज़गार हर स्थल पर सैकड़ों रूपों में मौजूद था। वह समझते थे कि इस जटिलता को नज़रअंदाज़ करना देश की आधी आबादी के लिए नई गुलामी की बेड़ियाँ गाड़ने वालों जैसा था।  उनका दावा था कि इस विशाल और जटिल देश में स्त्रियों के संघर्ष आज भी कायम है। इन संघर्षों की सांस्कृतिक ज़मीन को पुख्ता करना स्त्री-स्वतंत्रता की प्राथमिक और अनिवार्य शर्त है ।
बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था – ‘मैं नहीं जानता कि इस दुनिया का क्या होगा, जब बेटियों का जन्म ही नहीं होगा|’ स्त्री सरोकारों के प्रति डॉ भीमराव आंबेडकर का समर्पण किसी जुनून से कम नहीं था। सामाजिक न्याय, सामाजिक पहचान, समान अवसर और संवैधानिक स्वतंत्रता के रूप में नारी सशक्तिकरण लिए उनका योगदान पीढ़ी-दर-पीढ़ी याद किया जायेगा ।
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जय संविधान !! जय भीम !! जय भारत !!

वड़ोदरा नगरी व् ऐतिहासिक भीम संकल्प घटनाक्रम

वड़ोदरा नगरी व् ऐतिहासिक भीम संकल्प घटनाक्रम 
( संक्षिप्त परिचय )

सर्व विदित है कि आज भी दुनियाँ के किसी न किसी भाग से समता के अभाव में हिंसात्मक अमानवीयता के खतरनाक परीणाम दिन प्रतिदिन आते ही रहते हैं, ऐसी ही एक घृणित अमानवीयता की घटना वडोदरा नगरी में घटी, ज्ञातव्य है कि आधुनिक भारत के निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर यहाँ वड़ोदरा नगरी के महाराजा श्रीमंत सयाजीराव गायकवाड़ ( तृतीय ) द्वारा प्रदत्त उच्च शिक्षा के लिये ऋण शिष्यवृति अनुबंधनानुसार दी गई थी कि उच्चशिक्षा उपरांत कम से कम १० वर्ष की अवधि तक उन्हें अपनी सेवा वड़ोदरा रियासत को देनी होगी I शिक्षा उपरांत सितम्बर १९१७ में भारत के प्रथम दर्जे के विद्वान् बाबा साहब अपना कर्तव्य निभाने हेतु वडोदरा नगरी में पधारे, उन्हे यहाँ सैनिक सचिव के उच्च पद पर आसीन किया गया था लेकिन यहाँ के अधिकतर अधिकारी क्षुब्ध रह गये क्योंकि हिन्दू परम्परा के अनुसार वो एक अछूत व्यक्ति थे, अछूत को इतना बड़ा हौदा....? महाराजा के कृपापात्र व् भारत के प्रथम दर्जे के विद्वान् होने के बावजूद भी उन्हें यहाँ प्रति दिन भीषण मनुवादी मानसिकता से रोगग्रस्त सहयोगियों द्वारा जाति सूचक व् घृणित कटाक्षों की अति से अपमान की दुर्दशा का जहर पीना पड़ रहा था, उन्हें यहाँ रहने के लिए मकान तक नहीं मिला, एक पारसी की धर्मशाला में नाम बदल कर (एदल सोराबजी) रहना पड़ रहा था , लेकिन ये बात छुप नहीं सकी, मात्र ११ दिनों के अंदर ही अर्थात २३ सितम्बर १९१७ रविवार के दिन तो अति ही हो गई कि उनपर पारसी की धर्मशाला निवास पर लकड़ी डंडों से लेस लगभग दर्जन भर पार्सिओं ने क्षुब्ध अधिकारियों की सः से अतिअभद्रता के साथ आक्रामक हमला बोल दिया ... आरोप लगाते हुए कि तूने धर्मशाला को अपवित्र कर दिया . . . घोर अपमानित करते हुए उनका सामान भी बाहर फेंक दिया और

धर्मशाला को तुरंत ही खाली करने का फरमान भी सुना दिया I अब बाबा साहब इतने व्यथित हो चुके थे कि इस भयावह वातावरण से निकलकर वापिस मुंबई जाने के लिये निकले तो उस दिन मुंबई जाने वाली रेलगाड़ी भी लगभग ४ घंटे की देरी से चल रही थी, अतः इस भयावह वातावरण को ध्यान में रखते हुए बाबा साहब को इसी शहर से गुजरने वाली विश्वामित्री नदी के किनारे की पावन भूमि कमाटी बाग (पुराना नाम) - वर्तमान में “संकल्प भूमि सयाजी बाग” पर एक वट वृक्ष (संकल्प वृक्ष) के साये में शरण लेनी पड़ी, इन्ही पलों को व्यतीत करते हुए बाबा साहब असहनीय पीड़ा भरी सोच में डूब चुके थे कि मेरे ही देश जब मेरे जैसे भारत के प्रथम नंबर के महाशिक्षित विद्वान की ये दुर्दशा है तो शेष करोड़ों गुलामी भरा जीवन जीने वाले मानवों की दुर्दशा कितनी भयावह होगी . . . इस वक्त बाबासाहब की आँखों से अश्रुओं का झरना रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था . . . क्या ये अश्रु साधारण हो सकते थे ? इन्हीं अश्रुओं से भारत भाग्य विधाता बाबा साहेब के ज्ञान भंडार में, मष्तिष्क में उन करोड़ों-करोड़ों शोषितों, वंचितों . . . के रोते बिलखते चित्र उभरकर उनके मस्तिष्क में प्रतिबिम्बित हुए, आज उनकी मानवीय संवेदनाएँ कराह उठी थी – इसी वक्त एक दृढ संकल्प की चिंगारी उनके मष्तिस्क से निकली कि -“आज से मेरा परिवार वो समस्त करोड़ों करोड़ों शोषित-गुलामी भरा जीवन जीने वाले मानव हैं, मैं आज से जीवन पर्यंत सिर्फ समता के महान आदर्श के स्थापत्य व् मानवीय शोषण की भयंकर बीमारी के निर्मूलन के लिये अंतिम श्वास तक संघर्ष करूँगा” I
आज बाबा साहब ने वड़ोदरा नगरी तो छोड़ी, लेकिन ऋण मुक्त होने की जिज्ञासा अभी बाकी थी, आवास व्यस्था के लिए बडौदा विश्वविध्यालय के प्राध्यापक सेम्युअल लुक्श जोशी (विदेश में रहे सहपाठी व् घनिष्ट मित्र) के आश्वासन पर बाबा साहब का बडौदा रेलवे स्टेशन पर पुनः आगमन भी हुआ,लेकिन मित्र ने नौकर के हवाले से रेलवे स्टेशन पर ही पत्र भिजवा कर, पत्नी की तरफ से मनुवादी मानसिकता दर्शा दी..., आज फिर से मजबुरन यहाँ से ही लौटती रेलगाड़ी से वापिस लौटना पड़ा, इस वक्त भी फिर से कि –“अब मैं वड़ोदरा की धरा पर कभी भी कदम नहीं रखूँगा, केवल अपने दृढ संकल्प के लिये ही जीवन पर्यन्त संघर्ष व् कार्य करूँगा, मेरा दृढ संकल्प ही देश की एकता - अखंडता की मुख्य कड़ी होगा”I(ज्ञातव्य है कि उन दिनों देश के मानवों में असमानता की व्यापक भयंकर बीमारी के कारण ही देश में एकता - अखंडता की मुख्य कमी बनी हुई थी, परिणामतः देश गुलामी का जीवन जी रहा था I)
बाबा साहब ने फिर कभी वड़ोदरा की धरा पर कदम नहीं रखे अपितु उनकी अस्थियों को घोड़ा बग्गी में ससम्मान सुसज्जित कर, अस्थि सम्मान रैली के रूप में दर्शनार्थ हेतु संकल्प भूमि सयाजी बाग, वड़ोदरा पर दिनांक २४ दिसंबर २०११ को लाया गया I
इस तरह असंख्य आदर्श मानवतावादी संघर्षों की क्रांति इसी पावन भूमि पर लिये गए बाबासाहब के दृढ संकल्प से उद्गमित हुई, अनेको कष्ट भरी विषम परिस्थतियों को वो अपने दृढ संकल्प से कुचलते कुचलते, संविधान अंकुरण की इस प्रथमतः भूमि “संकल्प भूमि सयाजी बाग” से संविधान सभा के मुखिया बनकर पहुँचे और देश को दिया विश्व विख्यता-राष्ट्रीय ग्रन्थ - “भारत का संविधान” परिणामतः हमारा देश हुआ आधुनिक भारत > हमारा देश महान I
सच तो यह है कि न तो ये साधारण अश्रू थे न ही साधारण था संकल्प जहाँ अश्रु संविधान की स्याही थी वहीँ संकल्प एक सामाजिक न्याय की मानवीय संवेदनाओं की कलम I इस दिन से वो निजि परिवार तक सीमित नही रहे बल्कि समस्त भारत के करोड़ों-करोड़ों शोषितों, वंचितों को स्वीकारा अपना परिवार I
जरा सोचिये कि – (1)बाबा साहब अश्रू अपने गिराकर, खुशियाँ हमें बाँट कर चले गये . . .( 2) वड़ोदरा में वो प्यासे तक रहे पर हमारे लिए पानी पैदा कर गये I (3) एक दिन उनके पुत्र यशवंत राव ने जब बाबा साहब से ये प्रश्न किया कि आपने क्या दिया है हमें?. ... आपसे कम डिग्री धारियों के पास कई कई बंगले व् कारें हैं....बाबा साहब का उत्तर बड़ा ही ह्रदय स्पर्शी था - कि यशवंतराव तुम मेरे अकेले बेटे नहीं हो मेरी तो लाखों करोड़ों संतानें हैं,मैं लाखों करोड़ों संतानों के लिये घर बंगला व् कारों की व्यस्था के लिये संकल्पवद हूँI (4) संविधान से पहले केवल महारानियों की कोख से जन्मी संतानें ही शाशक, शाशिका बन सकते थे, लेकिंन बाबा साहब ने देश की हर महिला को महारानी होने का सम्मान व् अधिकार दिया, आज देश की कोई भी संतान इस देश के शाशक, शाशिका बनते हुए आप स्वतः परिणाम देख रहे हैं I (5) अनेकों विदेशी नोकरियों के अवसर सिर्फ अपने दृढ़ संकल्प को पुरा करने के लिये खोये, यही नहीं बाबा साहब ने अपनी चार चार संतानों को धन व् उपचार के अभाव में ही खो दिया, लेकिन दृढ़ संकल्प से पीछे नहीं हटे I (6) वड़ोदरा में उन्हें रहने का मकान तक नहीं मिला लेकिन करोड़ों उपेक्षित मानवों को देश की मुख्य धारा से जोड़कर महल, बंगला, मकान, दुकान व् कार लेने के समर्थ बना कर चले गये . . . .
क्या हमारा कर्तव्य नहीं बनता कि विश्व धरोहर दर्जे की पावन भूमि संकल्प भूमि सयाजी बाग पर सयुंक्त रूप से जुड़ कर इस महान पर्व के शताब्दी वर्ष पर २३ सितम्बर २०१७ को { देश विदेश के सभी मानवतावादी व् मानवतावादी संगठनो / विश्वशांति के संगठनो (सरकारी / गैर सरकारी ) अंतरराष्ट्रीय शताब्दी संकल्प दिवस महोत्सव के रूप में मनाकर महामानव, भारत भाग्य विधाता बाबा साहब के महान संकल्प को श्रद्धा सुमन के साथ इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज करायें I 

थोपी हुई नास्तिकता वंचित वर्गों की एकजुटता में बाधक

थोपी हुई नास्तिकता वंचित वर्गों की एकजुटता में बाधक
12 जुलाई, 2017 को मैंने * 'कुछ लोग डंडे के बल पर लोगों को बदलना चाहते हैं। ऐसे लोग मोस्ट वर्ग के सबसे बड़े दुश्मन हैं।'* शीर्षक से लिखे लेख में लिखा था कि-
1. हम सब को अभिव्यक्ति की आजादी है, लेकिन जमीनी सच्चाई को नकारना मेरी दृष्टि में बुद्धिमता नहीं। यद्यपि विचारणीय तथ्य यह है कि केवल और *केवल डिग्रीधारी या उच्च पद दिलाने वाली शिक्षा के अहंकार से संचालित लोगों की शैक्षिक ईगो (अहंकार) जीवन और समाज को दिशा देने के मामले में खतरनाक सिद्ध हो सकती है। बल्कि खतरनाक सिद्ध हो ही रही है।* मानव व्यवहार शास्त्र और मानव मनोविज्ञान का ज्ञान रखने वाले विश्वस्तरीय विद्वान्/मनीषी इस बात को जानते और मानते हैं कि *दुनिया केवल कानून, तर्क और तथ्यों से न कभी चली है और न कभी चल सकती। जीवन मानव के अवचेतन मन के गहरे तल पर हजारों सालों से स्थापित अच्छे-बुरे संस्कार, ज्ञान, अवधारणाओं, परम्पराओं और अनचाही आदतों से संचालित होता है।*
2. भारत के मोस्ट वर्ग में एक छोटा सा, बल्कि *मुठ्ठीभर लोगों का ऐसा समुदाय है, जो धर्म, अध्यात्म आदि को सीधे-सीधे ढोंग तथा अवैज्ञानिक करार देता है। ऐसे लोगों के समर्थन में भारत की एक फीसदी आबादी भी नहीं है।* जबकि यह वैज्ञानिक सत्य है कि अध्यात्म, प्रार्थना और मैडीटेशन का अवचेतन मन की शक्ति से सीधा जुड़ाव है। जिसे जाने और समझे बिना *अधिकतर आम आस्तिक लोग परमेश्वर, दैवीय शक्ति या अपने आराध्य की प्रार्थना करते हैं और आश्चर्यजनक रूप से उनको, उनकी प्रार्थनाओं के परिणाम भी मिलते हैं। जिसे मनोवैज्ञानिकों ने संसार के अनेक देशों, धर्मों और नस्लों के लोगों में बार-बार सत्य पाया है। यह अलग बात है कि प्रार्थनाओं से मिलने वाले परिणाम दैवीय शक्ति या आराध्य के ही कारण ही मिलते हैं, इसका आज तक कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन जिन आस्तिक लोगों को परिणाम मिलते हैं। उनकी आस्था को झुठलाना वैज्ञानिक रूप से इतना सरल नहीं है, जितना कि कुछ कथित कट्टरपंथी नास्तिक समझते हैं।*
3. कड़वा सच तो यह है कि *खुद को नास्तिक कहने और बोलने वाले सबसे बड़े/कट्टर आस्तिक होते हैं। इस विषय में, मेरी ओर से 23 अक्टूबर, 2016 को ''नास्तिकता और आस्तिकता दोनों ही मनोवैज्ञानिक और मानव व्यवहारशास्त्र से जुड़ी अवधारणाएं हैं'' शीर्षक से एक आलेख लिखा था। जिसमें मूलत: स्पष्ट किया गया था कि-
(1) मैं अनेक बार चाहकर भी अनेक (नास्तिकता और आस्तिकता से जुड़े) विषयों पर इस कारण से नहीं लिखता, क्योंकि अधिकांश लोग अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त हुए बिना किसी बात को महामानव बुद्ध की दृष्टि से समझने को सहमत ही नहीं होते हैं। ऐसे लोगों के पास अपना खुद का कोई चिन्तन, शोधन या परिष्कार नहीं होता है, बल्कि तोतारटन्त ज्ञान को अन्तिम ज्ञान मानकर विचार व्यक्त करते रहते हैं।
(2) नास्तिक और आस्तिक दोनों शब्द भी इसी कारण से समझने में दिक्कत पैदा करते हैं। हमारे यहां पर अधिसंख्य लोग और विशेषकर वे लोग जिनको मनुवादी कारणों से अस्पृश्यता और विभेद का दंश झेलना पड़ा है या झेल रहे हैं, जिनमें मैं भी एक हूं, उन में से अधिकाँश को हर एक बात धार्मिक चश्मे से ही दिखाई देती है।
(3) जबकि नास्तिकता और आस्तिकता दोनों ही मनोवैज्ञानिक और मानव व्यवहारशास्त्र से जुड़ी अवधारणाएं हैं, लेकिन मनुवाद विरोधी धर्म के चश्मे से देखने की उनकी आदत निष्पक्षता को छीन चुकी है।
(4) उदाहरण: एक भगवान को नहीं मानने वाला भारतीय व्यक्ति बेशक अपने आप को नास्तिक कहता रहे, लेकिन बीमार होने पर वह अपना उपचार उसी चिकित्सा पद्धति और उसी डॉक्टर से करवाता है। जिसके प्रति उसके मन में अनुराग, आस्था अर्थात् आस्तिकता होती है। इसी प्रकार रिश्तों, जाति, रंग, पूंजीवाद, समाजवाद या साम्यवाद आदि के प्रति अनुराग या आस्था होना भी मनोव्यवहारीय (मनोवैज्ञानिक) दृष्टिकोण से आस्तिकता का वैज्ञानिक प्रमाण है। मुझे पता है कि मनुवाद विरोधी चश्में से इन अवधारणाओं पर चिन्तन असम्भव है। अत: अनेक लोग कुतर्क और बहस कर सकते हैं, जबकि यह गहन चिन्तन और चर्चा का विषय है।
12 जुलाई, 2017 को लिखे लेख में मैंने आगे लिखा था कि-
4. जानने और समझने वाली बात यह है कि *इस संसार में ऐसी बहुत सी अज्ञात शक्तियां और ज्ञान की शाखाएं हैं, जिनके बारे में जाने बिना, उन विषयों पर (अन्तिम) निर्णय सुनाने वाले वास्तव में सबसे बड़े अमानवीय और अन्यायी हैं। वंचित/मोस्ट वर्ग में एक समुदाय ऐसे अन्यायी और नास्तिक लोगों की कट्टरपंथी फौज तैयार कर रहा है। जिसकी प्रतिक्रिया में वंचित वर्ग के एक तबके पर लगातार अत्याचार, व्यभिचार और अन्याय बढ़ते जा रहे हैं। जिसकी कीमत सम्पूर्ण मोस्ट वर्ग को चुकानी पड़ रही है। इस विषय में भी, मैं अनेक बार विस्तार से लिख चुका हूँ। फिर भी ऐसे लोगों की पूर्वाग्रही धारणाएं शिथिल नहीं हो रही हैं। जो मोस्ट वर्ग की एकता के लिये सबसे खतरनाक तथा भयावह स्थिति है।*
5. जिन लोगों को अवचेतन मन की शक्ति, मैडिटेशन (ध्यान की निश्छल नीरवता) और लॉ ऑफ़ अट्रेक्शन का प्राथमिक ज्ञान भी रहा होता है, उनके द्वारा कभी भी धर्म, आध्यात्म और आस्तिकता का विरोध नहीं किया जा सकता। लेकिन *कट्टरपंथियों द्वारा ब्रेन वाश किया हुआ पूर्वाग्रही विचारों से ओतप्रोत तथा शाब्दिक ज्ञान की धारा पर तरंगित मन-अवचेतन मन की शक्ति, आकर्षण, न्याय, युक्तियुक्तता, ऋजु इत्यादि अवधारणाओं को न तो जान सकता है और न ही उसे दूसरों की आस्थाओं, विश्वासों, संवेदनाओं तथा सिद्धांतों की परवाह होती है।*
6. वजह साफ है, क्योंकि ऐसे ब्रेन वाश किये हुए कट्टरपंथी लोगों और आतंकवादियों के मानसिक स्तर में कोई अंतर नहीं होता। बल्कि दोनों में मौलिक समानता होती है। वजह वैचारिक रूप से दोनों ही कट्टरपंथी होते हैं। कट्टरपंथियों और आतंकियों के अवचेतन मन में मौलिक रूप से एक बात बिठायी जाती है- *मैं जो जानता हूँ, जो करता हूँ, जो बोलता हूँ, वही सच है। अतः इस सच को सारी दुनिया को जानना और मानना चाहिए। जो नहीं मानते वे मूर्ख, गद्दार, देशद्रोही और असामाजिक हैं। अतः ऐसे लोगों को बहिष्कृत किया जाए या तुरंत रास्ते से हटा दिया जाए। दुष्परिणाम हर दिन हत्याएं और बलात्कार हो रहे हैं!*
7. भारत 1947 में आजाद हुआ। भारत में 1950 से लोकतंत्र की गणतंत्रीय व्यवस्था का संचालक संविधान लागू हुआ। इसके बावजूद भी सामाजिक न्याय से वंचित लोगों को संविधान के प्रावधानों के होते हुए न्याय नहीं मिल रहा है। अन्याय और अत्याचार यथावत जारी रहे हैं। वंचित-मोस्ट वर्ग संख्यात्मक दृष्टि से बहुसंख्यक एवं सशक्त होते हुए भी सात दशक बाद भी बिखरा हुआ है और हर मुकाम पर अपमानित तथा शोषित होने को विवश है। *जिसका मूल कारण है-आपसी एकता का अभाव है। मोस्ट वर्ग की एकता में बाधक वही लोग हैं, जिनके हाथ में मोस्ट वर्ग की लगाम रही है। उनको इतनी समझ तक नहीं कि लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करके, उनका स्नेह, अपनापन, सम्मान, मत और समर्थन हासिल नहीं किया जा सकता।*
8. ऐसे लोग इस देश की सत्ता को किसी न किसी बहाने अपने कब्जे में लेने के सपने तो देखते रहते हैं, लेकिन मतदाता के मनोभाव को नहीं समझना चाहते। अत: इनके सपने पूरे होना कभी भी सम्भव नहीं है। जो कोई भी व्यक्ति आम लोगों की सुन नहीं सकता, वह कभी भी अच्छा वक्ता नहीं बन सकता। क्योंकि वक्ता होने के लिए श्रोताओं की जरूरत होती है और श्रोता उसी को सुनते हैं, जो उनकी आस्थाओं, विश्वासों, भावनाओं, आकांक्षाओं, इच्छाओं और जरूरतों का आदर करता हो। *क्या कोई नास्तिक कभी भारत में 99 फीसदी से अधिक आस्तिक मोस्ट वर्ग के लोगों की भावनाओं को धुत्कार कर, उनका चहेता बन सकता है? मेरी राय में कभी नहीं।*
9. याद रहे-*पाखण्ड और आस्थाओं में अंतर होता है। कोई भी व्यक्ति एक बार पाखण्ड को छोड़ने या त्यागने को सहमत किया भी जा सकता है, लेकिन वही व्यक्ति यकायक अपनी आस्थाओं और विश्वासों को नहीं त्याग सकता।* हमें इस बात को स्वीकारना होगा कि परिवर्तन सतत प्रक्रिया है। जिसमें समय लगता है। पीढियां गुजर जाती हैं। तब कहीं थोड़े-बहुत बदलाव दिखने लगते हैं। इस बात को जाने बिना कुछ लोग डंडे के बल पर लोगों को बदलना चाहते हैं। ऐसे लोग मोस्ट वर्ग के सबसे बड़े दुश्मन हैं। *दुःखद स्थिति यह कि मोस्ट की कमान ऐसे ही लोगों के ही हाथों में है। इससे भी दुःखद यह कि इन लोगों में भी अधिकाँश लोग ढोंगी हैं।*
उपरोक्त लेख का देश के अधिसंख्य अपूर्वाग्रही विद्वानों ने समर्थन किया जो लेख की मूल भावना तथा लेखक का सम्मान है। इसी विषय में मुझे आगे यह और कहना है कि-
10. नास्तिकता और आस्तिकता जैसे विषयों पर सोशल मीडिया पर या वाट्सएप पर चैटिंग के मार्फ़त वांछित परिणाम मिलना तो संदिग्ध है ही, साथ ही साथ, इस कारण नजदीकी लोगों में आपसी दूरियाँ भी बढ़ रही हैं। अतः नास्तिकता समर्थक विद्वानों को कम से कम वंचित/मोस्ट वर्ग के विद्वानों को इस विषय पर समसामयिक हालातों के अनुसार समग्र समाज के हित और अहित को ध्यान में रखकर चिंतन करना होगा। अन्यथा बाद में पछतावे के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।
11. मैं निजी तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14, 21 एवं 25 के प्रकाश में धार्मिक मामलों को भारत के लोगों का निजी विषय मानकर, इन पर किसी के भी द्वारा, किसी पर भी अपने नास्तिकता के विचार थोपने या आस्तिकता का मजाक उड़ाने या नास्तिकता को स्थापित करने के लिये आस्तिकों को अपमानित करने के समर्थन में नहीं हूँ। हाँ पाखण्ड, ढोंग, अंधविश्वास आदि का आमजन के धार्मिक विश्वास और उस विश्वास के दैनिक जीवन में पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभावों का निष्पक्ष अध्ययन करने के बाद, इन पर अत्यधिक संवेदनशीलता के साथ काम करने की जरूरत है। जिससे कि लोगों की भावनाओं को आहत किये बिना, उनको स्वेच्छा से इन्हें छोड़ने के लिए सहमत किया जा सके।
12. निःसन्देह धर्मांधता वंचित वर्गों के समग्र विकास में बाधक है, लेकिन थोपी हुई नास्तिकता वंचित वर्गों की एकजुटता में सबसे बड़ी बाधा है! नास्तिकता का आरोपण करोड़ों लोगों के जीवन जीने के आधार धर्म, आस्था तथा विश्वास को कुचलने के समान है। हम जिन वंचित लोगों को आगे बढाने के लिये काम करना चाहते हैं। हम जिन वंचित लोगों के समर्थन से राजनीतिक सत्ता पाना चाहते हैं। यदि वही लोग असहज या नाखुश अनुभव करके, हम से दूर जाने लगें तो ऐसी नास्तिकता किस काम की? समझने वाली महत्वूपर्ण बात यह है कि जैसे-जैसे लोगों को सत्य के ज्ञान के साथ-साथ, सत्य का अनुभव भी होगा, स्वत: ही बदलाव की बयार बहने लगेगी।
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल
(HRD Mission-90 For MOST) 9875066111, 11092017
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