Tuesday, 5 September 2017

लालू प्रसाद यादव जी की रैली

लालू प्रसाद यादव जी विपक्षी पार्टियो को एक करने के लिए रैली कर रहे है जिसमे सपा, तुणमूल सहित कई विपक्षी पार्टी हिस्सा ले रही है, बसपा का कोई प्रतिनिधि जायेगा या नही इसके बारे में अभी पक्का नही पता है. अब फेसबुक पर, ट्विटर पर, व्हाट्सअप्प पर दलित चिंतक, लेखक दिन रात मायावती की बुराई करने में लगे हुए है. कह रहे है की लालू प्रसाद यादव व शरद यादव का खुलकर मायावती साथ नही देकर दलितों को गुमराह कर ही है. अरे भाई आपके लालू प्रसाद यादव व शरद यादव जी तब कन्हा था;

1.जब समाजवादी पार्टी दलित महापुरषो के नाम से बनी योजनाओ को खत्म कर रही थी. दलित महापूरषो के नाम से बने स्थलों के नाम चेंज कर रही थी.

2.जब समाजवादी पार्टी मान्यवर कांशीराम के नाम से बनी योजनाओ का नाम बदल रही थी व सरकारी सहायता को धीमी कर रही थी.

3.जब समाजवादी पार्टी प्रमोशन में आरक्षण बिल फाड़ रही थी. बिल फाड़ने की हिम्मत  भाजपा की नही हुई लेकिन समाजवादी पार्टी यह कारनामा कर गयी.

4.जब समाजवादी पार्टी दलितों के हितो के लिए योजना बनाने की बात तो दूर की है पहले से ही चली आ रही योजनाओ को बंद या धीमा कर रही थी.

5.जब समाजवादी पार्टी दलितों को सबसे ज्यादा नुकसान देने वाला "भूमि सुधार अधिनियम" पारित कर रही थी. पहले दलितों को भूमिहीन होने से रोकने के लिए यह व्यवस्था थी की एक सीमा तक जमीन दलित केवल दलित को ही बेचेगा लेकिन इस नये अधिनियम में अब दलित की जमीन कोई भी खरीद सकता है. इसका नुकसान यह है की जबरदस्ती, दारू, धमका कर दंबग अब आसानी से दलितों को जमीन से महरूम कर देंगे. कुछ दिनों में दलितो के पास जो कुछ जमीन थी वो भी नहीं बचने की.

उपर बताई गयी यह सिर्फ कुछ बाते है. पोस्ट लम्बी हो जाएगी अगर पूरी\ लिखना शुरू किया तो इसलिए आगे आप खुद जोड़ सकते है. अब मायावती ने जो शीटो के बंटवारे की बात कही है वो तरिफ के काबिल इसलिए है क्युकी;

1. यह लोग कब पलटी मार जाए कुछ पता नही है. देखा क्या मायावती जी से गठबंधन की घोषणा करवाकर शीटो के बंटवारे में धोखा दे दे. और मायावती ने कुछ ऐसा नही कहा जो की इम्पोसिबल हो. अरे भाई जब गठबंधन करना ही है तो पहले शीट निर्धारित करने में क्या दिक्कत है.

2.बहुजन एकता नाम की टोकरी पिछड़े वर्ग ने दलितों के सर पर रख रखी है और जब दलित हितो की बात आती है तो आँखे दिखाते है.. इसका प्रमाण है की जब समाजवादी पार्टी की सरकार थी तब समाजवादी पार्टी का यादव वोटर रोजाना दलितों को गरिया रहा था. समाजवादी पार्टी दुआरा दलितों के अहित के लिए की गयी किसी भी घोषणा पर "भांगड़ा डांस" कर रहा था. आज काफी यादव बुद्धिजीवी कह रहे है की "मायावती ने बहुजन एकता को नुकसान पहुचाया है" जबकि अखिलेश के समय यह लोग दलित विरोधी कार्यो पर "वाह-वाह" कर रहे थे.

3.बहुजन समाज पार्टी को गठबंधन में दिक्कत यह भी है की जब भी वो कोंग्रेस के साथ गठबंधन करती है तो जिन शीट पर कोंग्रेस खड़ी होती है उस पर दलित वोट उसे मिल जाता है लेकिन जो शीट बसपा के कोटे में आती है उस पर कोंग्रेसी बसपा को वोट करने की जगह भाजपा को कर देता है.

अब जो दलित बुद्धिजीवी, लेखक, चिंतक दिन रात अपना समय मायावती विरोध में लगा रहे है उन्हें यह समझ लेना चाहिए की;

1.आपके लालू प्रसाद यादव व शरद यादव को अगर बहुजन की इतनी ही चिंता है तो "दलित प्रधानमन्त्री" की घोषणा कियु नही कर देते. दलित अभी भी इनसे संख्या में काफी ज्यादा है.

2.जब इन्द्रजीत गुजराल को प्रधानमन्त्री बनाया जा रहा था तब आपके इन्ही साथियो ने दलित प्रधानमन्त्री नहीं बनाया जबकि उस समय राम विलास पासवान रेस में सबसे आगे थे.

3.इसलिए पूर्व के अनुभवो के आधार पर दलितों को अपनी जरूरत महसूस करवानी है. जनता पार्टी से लेकर तीसरे मोर्चे के अंतर्गत दलित प्रधानमन्त्री ही इसलिए नही बनाया गया है क्युकी दलित एक पक्ष के तौर पर अपने को पेश नही कर पाए. केवल मायावती ही दलितों को भारतीय राजनीती में एक पक्ष बनाने में कामयाब हुई है.

4.मायावती अगर व्यक्तिगत हित रखती तो हर सरकार में अपने वोट प्रतिशत के अनुसार केबिनेट मंत्री बन सकती है और साथ में अपनी पार्टी के दो या तीन को भी आसानी से मंत्री बनवा सकती है. लेकिन रामविलास पासवान, अठावले की तरह फिर चुपचाप दलित विरोधी कार्य होते हुए भी देखना पड़ता. इसलिए दलितों को एक पक्ष बनकर सत्ता में आने में फायदा है.

5.सत्ता की इतनी जल्दी दिखानी अपने सर पर पत्थर मारने के बराबर है. अरे भाई हद से हद क्या होगा दलित आरक्षण, अधिकार ही तो खत्म होंगे. हो जाने दीजिये, अभी भी कौन से सही उदेश्य में मिल रहे है. बल्कि इससे यह लाभ होगा की दलितों की सभी उपजातियो को अक्ल आयेगी जिसके बाद एक छतरी के नीचे जमा होंगे. अभी थोडा थोडा करके जो मिल रहा है उससे दलितों में एकता नही हो पा रही है. जब सभी कुछ छीन जायेगा तभी सभी कुछ पाने की इच्छा उत्पन्न होगी और तभी एकता होगी.

इसलिए स्वयघोषित बुद्धिजीवी, चिंतको, लेखको, और आजकल बाबा साहब के नाम पर गाने व नाचने वाले कविओ को यह समझ लेना चाहिए की "बाबा साहब ने जो यह स्लोगन की इस देश के शासक बनना है" तब तक पूरा नही होगा जब तक अपने को एक पक्ष के तौर पर भारतीय राजनीती में प्रस्तुत नही करेंगे. मायावती ने सफलतापुर्वक अपने आप को भारतीय राजनीती में एक पक्ष के तौर पर प्रस्तुत करा है. राजनीती में जीत-हार तो चलती ही रहती है. क्या फर्क पड़ेगा अगर अगले 20 साल भी एक भी शीट नही आयेगी. कम से कम एक पक्ष तो समझा जायेगा. अभी भी कौन सा रामविलास पासवान व अट्ठावले के मंत्री बन्ने से दलितों को लाभ हो रहा है.  इसलिए सत्ता के लिए इतने उतावले मत बनिए. और अगर बन ही रहे है तो मायावती की जगह अपना आधार बनाए. किसने रोका है.
 C/P. An Excellent Analysis.


*जानें मायावती ने राजद की पटना रैली में शामिल होने के लिए रखीं शर्तें*

पटना में 27 अगस्त को प्रस्तावित राष्ट्रीय जनता दल की रैली में शामिल होने से पूरी तरह किनारा कर बसपा प्रमुख मायावती ने विपक्षी एकता के प्रयासों को तगड़ा झटका दिया है। *आज गुरुवार* को पत्रकार वार्ता में मायावती ने स्पष्ट किया कि सीटों का सम्मानजनक बंटवारा न होने तक बसपा किसी स्थानीय या राष्ट्रीय दल के साथ मंच साझा नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि बसपा सेक्युलर ताकतों की एकजुटता की प्रबल पक्षधर रही है लेकिन, पिछले चुनावी अनुभव अच्छे नहीं रहे। टिकटों के बंटवारे के वक्त पीठ में छुरा भोंकने वाले दलों के कारनामे जनता को भी मायूस करने वाले रहे हैं।

पटना रैली से तीन दिन पहले मायावती ने गुरुवार दोपहर बाद अचानक पत्रकार वार्ता बुलाकर बसपा का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि पटना रैली में बसपा के शामिल कराने को राजद नेतृत्व द्वारा विशेष कोशिश की जाती रही है। रैली में बसपा के शामिल होने के सवाल पर सबकी निगाह लगी है। इसको लेकर तमाम भ्रांतियां फैलायी जा रही हैं। मायावती ने बताया कि इस बारे में राजद नेतृत्व को साफतौर पर बता दिया गया था कि बसपा अपने सिद्धांत, नीति और अलग कार्यशैली वाली पार्टी है। बाबा साहब का मिशन पूरा करने के लिए संघर्षरत रहती है।

भारत में sunday की छुट्टी

भारत में sunday की छुट्टी किस व्यक्ति ने हमें दिलाई?_*
*_और इसके पीछे उस महान व्यक्ति का क्या मकसद था?_*
*_क्या है इसका इतिहास?_*

         *_साथियों, जिस व्यक्ति की वजह से हमें ये छुट्टी हासिल हुयी है, उस महापुरुष का नाम है "नारायण मेघाजी लोखंडे". नारायण मेघाजी लोखंडे ये जोतीराव फुलेजी के सत्यशोधक आन्दोलन के कार्यकर्ता थे। और कामगार नेता भी थे। अंग्रेजो के समय में हफ्ते के सातो दिन मजदूरो को काम करना पड़ता था। लेकिन नारायण मेघाजी लोखंडे जी का ये मानना था की, हफ्ते में सात दिन हम अपने परिवार के लिए काम करते है।_*
     *_लेकिन जिस समाज की बदौलत हमें नौकरिया मिली है, उस समाज की समस्या छुड़ाने के लिए हमें एक दिन छुट्टी मिलनी चाहिए। उसके लिए उन्होंने अंग्रेजो के सामने 1881 में प्रस्ताव रखा। लेकिन अंग्रेज ये प्रस्ताव मानने के लिए तयार नहीं थे। इसलिए आख़िरकार नारायण मेघाजी लोखंडे जी को इस sunday की छुट्टी के लिए 1881 में आन्दोलन करना पड़ा। ये आन्दोलन दिन-ब-दिन बढ़ते गया। लगभग 8 साल ये आन्दोलन चला। आखिरकार 1889 में अंग्रेजो को sunday की छुट्टी का ऐलान करना पड़ा।_*
*यही बात को कानून बनाकर " बाबा साहेब अम्बेडकर " जी ने संविधान में रख दिया ।*
    *ये है इतिहास।*
*_क्या हम इसके बारे में जानते है?_*
*_अनपढ़ लोगों को तो छोड़ो लेकिन क्या पढ़े
 लिखे लोग भी इस बात को जानते है?_*

     *_जहा तक हमारी जानकारी है, पढ़े लिखे लोग भी इस बात को नहीं जानते। अगर जानकारी होती तो sunday के दिन enjoy नहीं करते....समाज का काम करते....और अगर समाज का काम ईमानदारी से करते तो समाज में भुखमरी, बेरोजगारी, बलात्कार, गरीबी, लाचारी ये समस्या नहीं होती।_*
*_साथियों, इस sunday की छुट्टीपर हमारा हक़ नहीं है, इसपर "समाज" का हक़ है। कोई बात नहीं, आज तक हमें ये मालूम नहीं था, लेकिन अगर आज हमें मालूम हुआ है तो आज से ही sunday का ये दिन सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित करें.!!_*

कलाम इफ़ेक्ट

एक सच्चे देशभक्त का कर्म

दूरदर्शन के एक दक्षिण भारतीय भाषा के चैनल से श्री पी एम नायर जोकि एक सेवा निवर्त प्रसाशनिक अधिकारी है और वो पूर्व राष्ट्रपति स्व श्री ए पी जे कालाम साहब के निजी सचिव उस वक्त थे जब कालाम साहब देश के राष्ट्रपति थे।

उनके उस इंटरव्यू के दौरान  श्री नायर साहब ने जो कहा
उसके कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को आपके सामने लाना चाहता हूं।

श्री नायर ने एक किताब भी लिखी है जिसका शीर्षक है *"कलाम इफ़ेक्ट"*

१. डॉ कलाम अपनी हर विदेश यात्रा में बहुमूल्य उपहार प्राप्त करते थे जो कि प्रथा अनुसार मेजबान देश के प्रमुख  मेहमान देश प्रमुख को उनके सम्मान स्वरूप देते है।

उन उपहारों को प्राप्त करने से मना करना मेजबान देश का अपमान होगा अतः कलाम साहब उन उपहारों को धन्यवाद के साथ स्वीकार करते थे।

परंतु देश वापिस आते ही वो उन उपहारों के फोटो खिंचवाकर उनकी सूची तैयार करवाकर उन को राष्ट्रपति भवन के संग्रहालय को सौप देते थे। फिर कभी भी उन उपहारों के बारे में पूछते भी नही थे।

कलाम साहब जब सेवा निवर्त हुए तो उन उपहारों से एक पेंसिल भी अपने साथ नही ले गए। सारे के सारे उपहार राष्ट्रपति भवन के संग्रहालय में रहे।

२.  २००२, ये वो साल है जब श्री कलाम भारत के राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए थे, रमजान जुलाई अगस्त के महीने में आया था।

इस अवसर पर इफ्तार की भोज को आयोजन करना राष्ट्रपति भवन की एक सामान्य प्रक्रिया थी।

डॉ कलाम ने श्री नायर को बुलाकर इस आयोजन पर आने वाले खर्च को पूछा और साथ मे पूछा कि वो क्यो इस इफ्तार भोज का आयोजन ऐसे व्यक्तियों के लिए करे जो स्वयम ही पहले से समर्थ है और प्रतिदिन अच्छा भोजन  प्राप्त करते है?

श्री नायर ने उन्हें बताया कि तकरीबन बाइस लाख रुपया उस इफ्तार भोज के आयोजन पर राष्ट्रपति भवन का खर्च होता था।

डॉ कलाम ने उन्हें आदेश दिया कि वो सारी रकम  को कुछ अनाथालयों में वस्त्र, भोजन और कम्बलों के रूप में दान की जाए।

उन्होंने अनाथालयों  का चुनाव करने के लिए एक टीम को जिम्मेदारी दी उस चुनाव के कार्य मे उन्होंने किसी भी प्रकार का दखल नही दिया।

जब टीम ने अनाथालयों की सूची तैयार कर ली तो कलाम साहब ने श्री नायर को अपने कमरे में बुला कर एक लाख रुपये का चेक, जो कि उनके निजी खाते से काटा हुआ था, दिया और कहा कि वो अपनी निजी बचत से ये थोड़ा सा धन दे रहे है जो अनाथलयो में दान किया जाए। उन्होंने साथ मे ये हिदायत दी कि उस चेक के बारे किसी को भी न बताया जाए।

श्री नायर ने उस इंटरव्यू में बताया कि वो कलाम साहब की उस हिदायत को सुनकर अचंभे में आ गये। उन्होंने कलाम साहब को कहा कि वो क्यो न सबको उस बात को बताये की इस देश के राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति है जो न केवल अपने अधिकार से जो खर्च कर सकते वो सारा धन, दान में देते है बल्कि खुद के निजी खाते से भी दान देते है

डॉ कलाम यद्यपि एक धार्मिक मुस्लिम थे, पर उनके कार्यकाल
में राष्ट्रपति भवन में इफ्तार का भोज का आयोजन नही हुआ।

३. डॉ कलाम को हा में हा मिलाने वाले लोग पसंद नही थे।

एक बार देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति महोदय से मुलाकात को पधारे थे और किसी विषय पर विचार विमर्श के दौरान डॉ कलाम ने एक बिंदु पर किसी बात पर अपने विचार प्रकट किए फिर उन्होंने नायर साहब से पूछा कि "क्या आप मेरी बात से सहमत है?"

"नही श्रीमान मैं आपकी बात से सहमत नही हूँ।" नायर साहब ने उनको जवाब दिया।

मुख्य न्यायाधीश महोदय को अपने कानों पर विश्वास नही हुआ कि एक सचिव की इतनी हिम्मत की वो राष्ट्रपति जी की बात से सहमत न हो और वो भी अन्य उपस्थित व्यक्तियों के समक्ष।

तब श्री नायर ने उन्हें बताया कि राष्ट्रपति जी उनसे पूछेगें की वो क्यो असहमत है और वो यदि मेरे कारण बताने के बाद यदि उन्हें मेरे बताये कारण सही लगे तो 99% ये बात सही है कि वो अपना निर्णय बदल देंगे।

४. एक बार उन्होंने अपने पचास रिस्तेदारो को दिल्ली बुलाया और उन्हें राष्ट्रपति भवन में ठहराया।

उन्होंने उनके दिल्ली दर्शन के लिए एक बस का प्रबंध करवाया और उस बस का किराया स्वयम के निजी खाते से वहन किया।
कोई भी सरकारी वाहन उन रिस्तेदारो के लाने लेजाने के लिए प्रयोग नही किया।

उन रिस्तेदारो के ठहरने के दौरान उन रिस्तेदारो के ऊपर जो भी खर्च उनको भोजन और ठहरने की व्यवस्था पर हुआ उसका पूरा हिसाब मांगा जो लगभग दौ लाख के आसपास हुआ। कलाम साहब ने वो सारा खर्च अपने निजी धन से वहन किया।

इस देश के इतिहास में उनसे पहले किसी ने भी ऐसा नही किया था।

अब आप एक और घटना को सुने।

डॉ कलाम के बड़े भाई उनके साथ उन्ही कमरे में पूरे एक सप्ताह रहे। ऐसा डॉ कलाम की इच्छा के अनुसार हुआ।

जब वो वापिस गए तो डॉ कलाम ने उनके रहने के दिनों का किराया भी देना चाहा।

जरा कल्पना कीजिये कि कोई राष्ट्रपति अपने रहने के कमरे का भी किराया देना चाहता था।

ये वैसे राष्ट्रपति भवन के कर्मचारियों ने नही माना और सबने सोचा कि ये तो ईमानदारी की परकाष्ठा थी।

५.  जब राष्ट्रपति कलाम साहब का कार्यकाल पूरा हुआ तब राष्ट्रपति भवन के सभी कर्मचारी अपने परिवार सहित उनके सम्मानार्थ उनसे भेंट करने गए।

श्री नायर उनसे मिलने अकेले गए तो कलाम साहब ने उनके परिवार के बारे में पूछा तब उन्हें पता चला की नायर साहब की पत्नी एक दुर्घटना के कारण पांव की हड्डी टूटने की वजह से चल नही पा रही थी और घर पर थी।

अगले दिन सुबह श्री नायर ने देखा कि बहुत से पुलिस वाले उनके घर के बाहर खड़े थे तो उन्होंने उसका कारण पूछा तो पता चला कि राष्ट्रपति महोदय स्वयम ही उनके घर आ रहे थे। कलाम साहब श्री नायर के घर जाकर उनकी पत्नी से मिले उनका हाल चाल पूछा और कुछ समय भी बिताया।

श्री नायर ने बताया कि कोई भी राष्ट्रपति अपने सचिव के घर कभी भी नही जाएगा और वो भी इतने साधारण वजह के लिए।

मेरे मित्र ने सोचा कि वो हमें ज्यादा से ज्यादा उस प्रसारित इंटरव्यू की बाते हमको बताये क्योकि वो दक्षिण भाषा के दूरदर्शन चेनल से प्रसारित हुआ था जिसे शायद ही किसी ने इस देश के भाग में देखा हो। इसलिए ये उस इंटरव्यू की बाते मुझे इंग्लिश भाषा मे भेजी उसे मैने सब की जानकारी के लिए हिंदी भाषा मे रूपान्तरित किया है।

हा एक बात और जो उस इंटरव्यू के दौरान पता चली की कलाम साहब के छोटे भाई एक छतरी की मरम्मत करने की दुकान चलाते है।  श्री नायर उनसे जब श्री कलाम साहब के अंतिम संस्कार के दौरान मिले तो उन्होंने श्री नायर के पांव छू लिए जोकि उनकी अपने बड़े भाई कलाम साहब और श्री नायर के प्रति श्रद्धा का प्रतीक था।

ये कुछ ऐसी बाते है जिनका प्रसार जन जन के बीच हो ताकि इनसे प्रेरणा लेकर शायद कुछ और कलाम इस पवित्र धरती पर पैदा हो।

व्यवसायी प्रसार के साधन शायद ही इन बातों को प्रसारित करे क्योकि इन बातों की टेलिविज़न रेटिंग पॉइंट यानी टीआरपी कीमत नही है।

कृपया आप इसे अवश्य ज्यादा से ज्यादा आगे इसे प्रसारित करे ताकि संसार को इस विभूति के बारे में ज्यादा से ज्यादा पता चले।

(जैसा प्राप्त वैसा सांझा किया) वेसे भी कलाम साहब बहुत अच्छे शिल्पकार थे आज भी उनके घर क्रति का भण्डार है ! 

जय हिन्द 🙏🏼 जय भारत 🙏🏼

गणेश पूजन

*➖गणेश पूजन पर विशेष ➖*
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*गणपती का रहस्य और ब्राह्मणीकरण*
*:::::::::::: कृपया पढें ::::::::::::::::::*
बुद्ध का मतलब ही *अष्टविनायक* है।
*पोस्ट जरा बड़ी है लेकिन आँखे खोलकर पढ़े...*
✅लोकशाही व्यवस्था में देश का प्रमुख *"राष्ट्रपति"* होता है, उसी प्रकार प्राचीन भारत में गण व्यवस्था होती थी और उस गण व्यवस्था का प्रमुख *"गणपति"* होता था।
~ *"गणपति बाप्पा मोरया"* अर्थात ~ मौर्य राजाओ में गणपती *"चन्द्रगुप्त मोरया"* ~
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*मूलनिवासीयों के राजाओं का कार्यकाल ई.पू.*
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1~चन्द्रगुप्त मौर्य 323~299 ई.पू.
2~बिन्दुसार 299~274 ई.पू.
3~सम्राट अशोक 274~138 ई.पू.
4~कृंणाल मौर्य। 238~231 ई.पू.
5~दशरथ मौर्य 231~223 ई.पू.
6~सम्प्रति मौर्य 223~215 ई.पू.
7~शाली शुक्त 215~203 ई.पू.
8~देव वर्मा मौर्य 203~196 ई.पू.
9~सत्यधनु मौर्य 196~190 ई.पू.
10~बृहद्रथ मौर्य 190~184 ई.पू.
✅ इस मौर्य शासन से पहले प्राचीन भारत में एक राज घराने में *"सिद्धार्थ गौतम"* नामक राजकुमार का जन्म हुआ था। वही आगे चल कर *"शाक्य गण"* का प्रमुख हुआ।
कालांतर में सिद्धार्थ ने बुद्धत्व प्राप्त किया।
✏अब सच्चे गणपति और काल्पनिक गणपति के बीच में का फर्क समझ लेते है...
✅कूछ चालाक ब्राहमणों ने सच्चे गणपति को काल्पनिक गणपति बनाया। शाक्य गण का प्रमुख इस नाते से लोग "बुद्ध "को गण का पति अर्थात गणपति कहने लगे थे।
उसी प्रकार-
✅जब बुद्ध लोगों को धर्म का सन्देश देते थे तब उनके संदेशों में दो शब्दों का मुलभुत रूप से उल्लेख होता था, वे शब्द है,
1~ चित्त और 2 -मल्ल
✅ चित्त यानि शरीर (मन) और मल्ल यानि मल (अशुद्धी) तुम्हारे शरीर व मन से मल निकाल देने पर तुम शुद्ध हो जाओगे और दुःख से मुक्त हो जाओगे। ऐसा बुद्ध कहते थे।
इसी संकल्पना को विकृत कर, ब्राह्मणों ने काल्पनिक पार्वती के शरीर से मल निकालकर एक बालक (अर्थात गणपति) के जन्म की कहानी को प्रस्तुत कर दी।
✅ गौतम बुद्ध नागवंशी थे। पाली भाषा में "नाग "का अर्थ " हाथी "होता है। अर्थात बुद्ध हाथी वंश के थे।
इसलिए इस नए जन्मे बालक (सिद्धार्थ) को हाथी के स्वरुप में बताया गया है।
~ अर्थात, हाथी बुद्ध के जन्म का प्रतीक है और हाथी बौद्ध धर्म का भी प्रतीक है। इस सत्य को छुपाने के लिए, ब्राहमणों ने काल्पनिक पार्वती के काल्पनिक पुत्र को हाथी की गर्दन लगाई, किसी अन्य प्राणी जैसे शेर, बैल, घोडा, चूहा की गर्दन नहीं लगाईं......!!!
**** *अष्टविनायक का सत्य* ****
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✅जगत में दुःख है, यह बात दुनिया में सबसे पहले बताने वाला बुद्ध ही था और दुःख को दूर कर सुखी होने के लिए अष्टांगिक मार्ग भी बुद्ध ने ही बताया।
*"अष्टांगिक"* मार्ग का अवलम्ब करने से दुःख नष्ट होता है। यह बुद्ध ने सिद्ध कर दिखाया। यह आठ नियम या सिद्धांत विनय से सम्बंधित है।
इसलिए, बुद्ध को 'विनायक' कहा गया और *"आठ मार्गो"* पर विनयशील होने से *"अष्टविनायक "* भी बुद्ध को ही कहा गया।
✅अर्थात, अष्टांगिक मार्ग से अष्टविनायक होकर दुःख को नष्ट कर सुख की प्राप्ति करवाने वाला बुद्ध था। इसलिए, बुद्ध को लोग 'सुखकर्ता और दुखहर्ता' कहने लगे।
✅इस सत्य को दबाने के लिए ब्राहमणों ने काल्पनिक गणपति को अष्टविनायक भी कहा और सुखकर्ता दुखहर्ता भी कहा।
इसका मतलब यह है की, गणपति दूसरा तीसरा कोई नहीं है,
बल्कि, तथागत बुद्ध ही गणपति है। ब्राहमणों ने बुद्ध अस्तित्व को नष्ट करने के लिए काल्पनिक गणपति का निर्माण किया।
बौद्ध-ग्रंथों का ब्राह्मणीकरण करते समय ,उन्होंने कई गलतियां की, जिससे ब्राह्मणों की बदमाशी उजागर होती है।
*वे गलतियां इस प्रकार है
✅शिव शंकर जब देवों का देव है, तो उन्हें गणपति का सर धड से अलग करते समय उन्हें, यह पता क्यों नहीं चला कि वह उसका ही पुत्र है?
✅जब गणपति देव था, तो उसे यह कैसे पता नहीं चला की, जिसे वह रोक रहा है वह उसका ही बाप है?
✅शंकर को यह कैसे पता नहीं चला की, बिना उसकी अनुपस्थिति में उसकी बीवी गर्भवती कैसे हो गयी, जब्कि वह नौकरों की सुरक्षा में थी।
✅अगर पार्वती शरीर के मैल से बालक बना सकती है, तो वह उसी मैल से बालक का सिर क्यों नही बना पाई? खैर ये कहें की पार्वती नहा कर आई थी।
✅लेकिन, जीवन मृत्यु का शाप वरदान देने वाले शंकर की शक्ति कहाँ गई थी ? शंकर ने एक निष्पाप हाथी की जान क्यों ली ?
✅सोचे की क्या किसी छोटे से (बालक) की गर्दन में हाथी का सिर फिट कैसे बैठ गया ?
अफसोस है कि परशुराम ने गणेश का दांत भी तौड दिया, मगर सभी जौडना भूल गये!
आगे कृतयुग में गणपति का वाहन सिंह था और उसके १० हाथ थे।
त्रेतायुग में उसका वाहन मोर था और छ: हाथ थे।
द्वापरयुग मेंउसका वाहन मूषक अर्थात चूहा था और चार हाथ थे।
अगर अलग अलग युग में वह हाथ और शरीर कम ज्यादा कर सकता था।
तो, उसने खुद के सिर का निर्माण क्यों नहीं किया ?

✅प्राणी हत्या से जन्मे गणपति को सुखकर्ता, दुखहर्ता कैसे कहा जा सकता है ?
जब्कि विघटन गणेश व शिव के बीच हो गया था।

✅ *"शिव पुराण"* के अनुसार पार्वती ने बनाए मैल के गोले पर गंगा का पानी गिराया और गणेश  का जन्म हो गया ।
गणेश =गण+ईश यानी गण व मालकिन का अंश, गण के ईश्वर से गणपति कर दिया.....

*ब्रम्हवैवर्त पुराण ने तो हद ही कर दिया है !!!👇*

✅पार्वती वह मैल का गोला ब्रह्मदेव के पास ले जाती है और उसे जिन्दा करने के लिए विनती करती है, तब उस पर ब्रह्मदेव अपने वीर्य का छिडकाव करता है और उस गोले का सर्वप्रथम  "मलेश" नाम का  गणपति बनता है।
फिर मल+ईश= मल,गन्दगी के ईश्वर कहलाता है।

✅अब प्रश्न यह है कि, गणपती शंकर का पुत्र था या ब्रह्मदेव का...? या दोनों का?

✅गणपति विवाहित है, ऋद्धी और सिद्धी दो पत्नियाँ  थीं। यह ब्रह्मदेव की दोनों लड़कियां उसकी दो पत्नियाँ है। अर्थात, ब्रह्मदेव के वीर्य से जन्म लेने पर गणपती ने अपनी ही बहनों के साथ शादी क्यों की ..?

✅ *"सौगन्धि का परिणय"* इस संगीत सूत्र के तीसरे अध्याय में गणपति का उल्लेख कामवासना(sex) के असुरों में से छठवां असुर जैसा उल्लेख किया है।

✅चन्द्रगुप्त मोर्य के मोर्य वंश का गणपति हुआ था। इसलिए ब्राहमणों ने *"गणपति बाप्पा मोरया"*  की घोषणाएँ कर दी ......
मोरया शब्द के बारे में ब्राह्मणों के इतिहास में कोई उत्तर नहीं है...
कर्नाटक में चन्द्रगुप्त मोर्य ने जैन धर्म का प्रचार किया था। इसलिए उस क्षेत्र में कई लोग खुद के नाम के साथ  मोरया नाम लगाते हैं ।
महाराष्ट्र में मोरे सरनेम भी मोर्य वंश का ही अपभ्रंश है।
संत तुकाराम  मोरे थे..

इस सत्य को छुपाने के लिए ब्राह्मणों ने यह अफवाह फैलाई की १४ वीं सदी में, एक मोरया नामक गोसवि हुआ और उसके नाम पर से मोरया शब्द गणपती से जुड़ गया! ब्राह्मण लोग भी झूठ पर झूठ की सीमा लांघ देते हैं!!

✅संत तुकाराम महाराज , शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज की हत्या करने के बाद ब्राह्मणों ने शिवशाही को पेशवाई में बदल डाला और बौद्ध गुफाओं और विहारो की जगह पर कब्जा क़र, वहां पर काल्पनिक देवी देवता को बिठाना शुरू किया ।
कार्ला की बुद्ध गुफा में बुद्ध माता महामाया को ब्राह्मणी *"एकविरा देवी"* का स्वरुप दिया,
जुन्नर के लेन्याद्रि बुद्ध गुफा में गणेश को बिठाकर उसे काल्पनिक अष्टविनायक गणपती का प्रमुख स्थल बता दिया, शेलारवाडी, पुणे की लेणी में शिवलिंग बिठाकर, कब्जा कर लिया ..आदि
इसके प्रमाण हैं..

✅सत्य इतिहास यह है कि, संपूर्ण प्राचीन भारत बौद्धमय था। अशोक सम्राट ने बुद्ध के बाद सारे भारत को बौद्धमय बनाया था। लेकिन ब्राम्हण समाज ने अशोक के वंश को ख़त्म कर बौद्ध धर्म में मनुवादी ब्राह्मणों ने मनगढ़ंत विचार और इतिहास की मिलावट की और 33 कोटि देवताओं को अवतरित कर दिया और एक दूसरे का अवतार घोषित कर दिया।

✅भारत महाद्वीप  में वास्तव में शाक्य गण के गणपति हुए हैं और, उसी गणपति शब्द का ब्राह्मणों ने ब्राह्मणीकरण करके, समाज में झूठे गणेश में  गणपती को जन्म दे दिया हैं।

✅ इस झूठे काल्पनिक गणेश उर्फ गणपती के नाम पर सम्पूर्ण समाज को अन्धश्रद्धा में डूबो दिया और त्यौहार उत्सव के नाम पर ब्राह्मणों ने समाज से धन दौलत लूटना व अवतरित देवी देवताओं के मन्दिरों के नाम पर जगह-जगह भूमि पर कब्जे करना शुरु कर दिया।

✅शिवाजी महाराज महाराष्ट्र के कूर्मि अर्थात मराठा (शुद्र) मूलनिवासी राजा थे । शिवाजी महाराज की हत्या ब्राह्मणों ने ज़हर दे कर  की। जिसका बदला संभाजी महाराज ने अनेक ब्राह्मणों को हाथी के पैर के नीचे कूचलवा कर, मरवा  दिया था। इससे आहत होकर ब्राह्मणों ने छल-कपट  से संभाजी महाराज को औरंगज़ेब के हाथों में पकड़वा दिया और पूना शहर के चौराहे पर  मनुस्मृति के मुताबिक जीभ-सर कटवा कर उन्हें मार डाला। उस दिन ब्राह्मणों ने उनके पेशवा राज्य में, उत्सव के रूप में शक्कर बाटकर, उस दिन को *"गुढीपाडवा त्यौहार"* का नाम दिया ।

इस तरह ब्राह्मणों ने शिवाजी और संभाजी महाराज दोनों का क़त्ल किया और मराठा वंश को खत्म कर स्वयं पेशवा ब्राह्मण शासन करने लगे।

🌹शिवाजी महाराज की मृत्यु के बाद महात्मा ज्योतिराव फुले ने रायगढ़ में उनकी समाधि ढूंढ़ निकाली थी और जून 1869 में शिवाजी महाराज के शान में *"पेवाडा "* लिखा। महात्मा ज्योतिराव फूले ने 1874 में महाराष्ट्र के बहुजनो के लिए पहली बार शिवाजी जयंती (शिव जयंती) मनाई। बहुजनों को जागृत करने के लिए फुले जी ने *"शिवजयंती उत्सव"* को, हर साल दस दिन तक मनाना चालू किया।
✅महाराष्ट्र में महात्मा ज्योतिराव फूले द्वारा बहुजन शुद्रो~अतिशुद्रों (sc~st~obc) में "शिव जयंती "के प्रभाव और जागृति के कारण ब्राह्मण डरने लगे। इसलिए, रत्नागिरी (महाराष्ट्र) के बाल गंगाधर तिलक नामक कट्टर ब्राह्मण ने *"शिव जयंती"* से बहुजनों में बढ़ती जागृति और प्रभाव को ख़त्म करने के लिए, विरोध स्वरूप  गंगाधर-तिलक ने सन् 1893-94 में गणपति महोत्सव का सार्वजानिक आयोजन किया ।

👉क्या 1893~94 से पहले महाराष्ट्र में गणोंत्सव मनाया जाता था.....??? उत्तर - बिलकुल नहीं!!!
~~ इसका कोई भी प्रमाण इतिहास में  उपलब्ध नहीं है .....!!!!

👉ब्राह्मणों के मुताबिक भगवान् शंकर का ठिकाना हिमालय मे उत्तर भारत के आसपास है, तो उन्होंने *गणेश (शंकर पुत्र)* को महाराष्ट्र में ज्यादा प्रचलित क्यों कारवाया....
उत्तर भारत में क्यों नहीं .......?

➡इसका मुख्य कारण यह है कि, शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज की हत्या ब्राह्मणों ने की थी। इस बात का ब्राह्मणों को डर था की, अगर इस तथ्य का पता मूलनिवासियो को चलेंगा तो ब्राह्मणों का अंत निश्चित् है ।
इसलिए, ब्राह्मणों ने महाराष्ट्र में महात्मा ज्योतिबा फूले के शिव जयंती उत्सव से जागृत हो रहेे मूलनिवासी शुद्रो को शिवाजी व संभाजी महाराज की हत्या ब्राह्मणों द्वारा हुई है, यह पता ना चले, इसके लिए, उनका ध्यान डाइवर्ट करने के हेतु उन्होंने *"शिव जयंती"* महोत्सव के विरोध में गणपति महोत्सव को महाराष्ट्रा में सार्वजनिक कर दिया ।

इसी तरह भारत के विभिन्न धर्मों, ग्रंथों व देवी देवताओं  का, मनुवादी ब्राह्मणों ने मनघडंत  ब्राह्मणीकरण कर दिया। भारत के अन्य धर्मों,  समुदायों के देवता, महात्माओं को विष्णु व शिव का अवतार और संत, ऋषि मुनियों को ब्राह्मण की औलाद बताकर प्रचार-प्रसार किया। जिस किसी व्यक्ति ने इनके ब्राह्मणीकरण का विरोध किया उन्हें संत तुकाराम, स्वामी दयानंद, कुलबर्गी, रैदास आदि की तरह मरवा दिया गया।


हर मूलनिवासियों के त्यौहारों में  मनघडंत कथाएँ बनाकर, मनुवादी ब्राह्मणों ने काल्पनिक व अवतारवादी देवी देवता व त्यौहार घूसेड दिये।  सामाजिक रुप से अमर्यादित,घृणित व अपमानित रिश्ते-नाते,  लोग व कुकृत्यों को ,मनुवादियों ने देवी देवता के नाम पर महिमा-मंडन कर पूजनीय बना दिया

जब शिव पार्वती के पुत्र गणेश का सर कटा  तो वह मर गया ठीक उसी प्रकार जब हथनी के बच्चे का सर काटा तो वह भी मर गया |जब दोनो मर गये तो हाथी का सर जोड़ने पर जिंदा कैसे हो गये जबकी प्राण किसी मे नही है ? वह प्राण किसका था ? वह प्राण किसके पास था ?? वह प्राण कहाँ और कैसे रखा था ? जब दो  मरे हुए को जोड़कर जिंदा किया जा सकता है तो गणेश के वास्तविक रूप को ही क्यो नही जोड़ा गया ?  बिल्कुल सीधा व सधारण सा प्रश्न है  , जिसका जवाब न किसी ने दिया और न ही दिया जाना सम्भव है | अगर ये सवाल पढ़कर आप लोगो बुरा लगा तो हाथ जोड़कर माफी माँगता हूँ , परन्तु आप एक बार ईष्या , द्वेश, जलन, को छोड़कर ईमानदारी से विचार करना और अपनी अन्तरात्मा से जवाब माँगना !! सच्चाई की झलक जरूर दिखाई देगी जबकी पुराण तो गप्प और झूठ के आधार पर लिखा गया है | इसलिए तो कहता हूँ पुराण मे विज्ञान , ना बाबा ना! पुराण मे तो केवल मानने वाली बात है वैज्ञानिक नही। कुछ अन्य विचारनीय प्रश्न :-

१. हाथी का रूधिर वर्ग ( ब्लड ग्रुप ) मानव से कैसे संयोग कर सकता है ??
२. हाथी की माँसपेशियो के साथ मनुष्य का संयोग कैसे हो सकता है ??
३. किस विज्ञान से हाथी के मस्तक के साथ मनुष्य के धड़ का संयोग सम्भव है ??
४. हाथी के चर्म की मोटाई ज्यादा और मनुष्य का सधारण फिर संयोग कैसा ??

ये शायद पाखंडी हिन्दू धर्म के ठेकेदारों और पंडित का विज्ञान हो सकता है  केवल पाखंडी पंडित के विज्ञान मे ही कुछ भी सम्भव है | क्योकी वहाँ मानने वाली बात है और अगर आप इसपर सवाल कर दे तो आपको मुस्लमान की उपाधी मिलती है जैसे कुरान पर सवाल करने वालो पर मुस्लमान गुमराह या काफिर की उपाधी देते है | इन सवालो को कम से कम दस हिन्दू धर्म के ठेकेदारों और पंडितो से पूछा पर जवाब किसी के पास नही | सभी का एक ही जवाब था यह सब श्रद्धा की बाते है | हमारे पूर्वजो ने माना है और पूजा है |

 (गनेश) वह किसी शिव पार्वती का बेटा नही , उसके हाथ पैर नही , उसका पसंदीदा भोजन लड्डू नही, चूहे की सवारी नही | ए सब अंधविश्वास पाखंड आडंबर हैं और मनगढ कहानी है



मैल से बालक पैदा हुआ , फिर गर्दन कटी , फिर हाथी की नई खोपड़ी जुड़ी . . .फिर उस गणेश ने खूब शरारत की . . .खेला कूदा , चूहे की सवारी भी की . . .और कुछ सालों बाद जवान भी हुआ . . . .फिर धूमधाम से उसकी शादी भी हुई . . . . . . .
उसके बाद . . . . . .उसके बाद . . . ...फिर उसके बाद . . .!!! ! ! ! !!
अरे फिर उसके बाद क्या हुआ ??????????
अरे जब बच्चा बड़ा हुआ . . .फिर जवान हुआ . . .तो बूढा भी हुआ ही होगा . . . .उसके बच्चे उसके नाती पोते भी हुए ही होंगे . . . . .अरे तो फिर गणेश का क्या हुआ . . . .?????
और ये जितने भी भारतीये भगवान  हैं उनका क्या हुआ ?????आज कल कर क्या रहे हैं वे सब ??????......
सीधी सी बात . . .लेखक ने जहां तक कथा कहानी लिखी . . .वहीं तक हमें पढने को मिली . . . .लिखाई बंद . . .कहानी अंत . . . .काल्पनिक कहानियों का कैसा परिवार कैसी पूरी कहानियां . . . .एक बच्चा पैदा हुआ . . .उसे हवन पूजन करवा कर Shaktiman बनाया गया . . . .
वो शैतानों को मारता था,, कपाला जैकाल किल्विश को मारता था,, जनता को खतरे से बचाता था . . .फिर उसकी शादी गीता विश्वास से हो गई . . . . . . . .....अरे फिर उसके बाद क्या हुआ . . . . . .???????
shaktiman बूढा हुआ कि नहीं ?????
उसके बच्चे पोते नाती हुए कि नहीं . . . . .?????
अरे मूर्खों . . . . Director ने कहानी यहीं पर बंदकर दी . . .script खत्म कहानी भी खत्म . . . .
Shaktiman कोई वास्तविक पात्र थोड़ी था जो उसकी आगे की कहानी लिखी जाती . . . . ....
यही हाल भारत के शिव गणेश पार्वती विश्नू ब्राह्म्मा नामक काल्पनिक पात्रों का भी है . . ..
इसमे मेरे मंन मे कुछ सवाल है।
1 इतना मैंल पार्वती पर कहा से आया।
2 गनेश की मृत्यु कब ओर कहा हुई
3 इसको पानी मे ही क्यों डुबाया जाता है ओर जब भी डूबता है तो 10_20 को क्यों लेकर डूबता है ये। क्या ऐसा भी कोई भगवान होता है जो भक्तो को मरवाता है।
4 ये कोनसी जगाहा रहता था।
5 इसने चुहे पे कितने देश की सवारी की या भारत देश मे ही कहा कहा घूम लीया।
6
इसको हाथी का मुह कैसे लगा उस हाथी का blood group क्या था
7 इसको भारत के बाहर कोई भी क्यों नही जानता।
कोईभी सवाल का जवाब दे सकता है।
अगर नही दे सकता तो तो इसको भी गप्प समज के जल प्रदूषण ध्वनि प्रदूषण को बचाये तथा अपना कीमती वक्त बचाकर पढ़ाई या अपना काम करे
शौजन्य अंधविस्वास की कैद रिटर्न


*भारत दुनियां का एकमात्र ऐसा देश हैं जहाँ.....*


*कन्या दान होती हैं*

*मृत लोगो को भोजन खिलाया जाता हैं*

*जानवर को माँ कहाँ जाता हैं और उसी माँ का दूध बेचा जाता हैं और यदि ये माँ दूध न देवे तो इस माँ को ही बेच देते हैं इसके लाल*
*जानवर का पेशाब पिया जाता हैं*
*प्यासे को पानी पिलाने से पहले उसकी जाति पूछी जाती हैं*
*जानवरो के रूप में भगवान अवतार लेते रहे हैं*
*महामानवों को राक्षस की उपाधि दी जाती हैं*
*जिसकी पूजा करते हैं उसके दर्शन होने पर कत्ल करते हैं*
*माँ बाप के लिए वृद्ध आश्रम खोले जाते हैं और जानवरों को माँ बाप बनाकर पुज्वाया जाता हैं*
*ज्यादातर भगवान माँ के पेट से जन्म न लेकर जानवरो से पैदा हुए*
*यहाँ 33 करोड़ देवी देवता विराजमान हैं*
*लड़के को शादी के नाम पर बेचा जाता हैं लड़की पक्ष भुगतान करता हैं*
*अनपढ़ लोगो से ज्ञान लिया जाता हैं।।*
*इत्यादि ।*
*भारत ही ऐसा देश है जहाँ*
*मुसलमानों को हमेशा अपनी देशभक्ति का सबूत देना पड़ता है,*
*शूद्र को अपनी क़ाबलियत का,*
*और औरतो को अपने चरित्र का*


*- डॉ बी आर आम्बेडकर*


 *तीज*

कल मेरी पत्नी एवं उनकी सहेली तीज पर *हरितालिका तीज* व्रत कथा कह रही थी, मैं बगल में कम्प्यूटर पर काम करते हुये  सुन रहा था।
        पार्वती जी शिव जी से पूछती है कि आप जैसे वर हमें कई जन्म तक कैसे मिल सकता है तो शिव जी कहते हैं, तुम्हारी शादी तो विष्णु से तय हो चुकि थी, पर तुम अपने दोस्त के साथ यही व्रत आज के ही दिन की थी इसीलिए मैं तुम्हारा पति बन पाया।
         अब सभी औरतों के लिये इंस्पिरेशन, शिव जी एवं पार्वती के माध्यम से ब्राह्मणिक लूट एवं डर सुनिए।
     आज के दिन तीज करने से महिलाएं अखण्ड स्वभाग्यवती, कई जन्मों तक शिव जैसे वर एवं स्वर्ग प्राप्त करेगी।
           नहीं करने नरकगामी, पानी पीने पर मच्छली, फल खाने पर बन्दर, सो जाने पर अजगर, पति से झुठ बोलने पर मुर्गा, अनाज खाने पर सुअर, मांस खाने पर पिशाचिन, मक्खी इत्यादि का डर पैदा किया गया है।
           इसके बाद अब ब्राह्मणों को बांस के दौरी या पीतल बर्तन में भर कर अन्न, वस्त्र इत्यादि दान करें। न करने पर नरक गामी।
          यानि पूरा खेल *पुनर्जन्म* वो भी किसी भी जीव में, *स्वर्ग -नरक* एवं हर जन्म में वही *शिव जी जैसे रोमियो, राँझा, मजनू, महिवाल, फरहात पति* मिलने के आकांक्षा में होता है।
          हमें जानना चाहिये आज अन्न एवं पीतल का महत्व भले ही घट गया है, पर 40 साल पहले साधारण परिवार में दोनो शाम भोजन एवं पीतल का बर्तन पाना कठिन होता था, क्योंकि मिट्टी बर्तन में ही खाना बनता था। उटेंसिल के लिये बर्तन भी अंग्रेजों के बाद ही शुरू हुई थी।
          अब समझ आ गयी होगी कोई 18वीं सदी में पीतल उटेंसिल के बाद हीं ब्राह्मणों द्वारा किताब लिखी गयी। जिसमें भोजन एवं वस्त्र जो आम जन के लिये काफी कठिन थी, पर ब्राह्मणों को देना अनिवार्य बना दी गयी। नहीँ तो नरक एवं सुअर में अगला जन्म कन्फर्म।
            अब आज की बात:
        सुबह इन पतिव्रताओं की सहेली इंतजार में थी कि पंडित जी कब आयेंगे मिष्टान, कपड़े एवं पीतल वर्तन में अन्न लेने के लिये। मैंने मना किया ऐसा करने को। पर, कई औरतें खुद जाकर मन्दिर में दान कर चुकि थी।
       जब रास्ते से गुजर रहा था तो गोला रोड, पटना के शिव मंदिर पर नजर पड़ी, वहाँ मन्दिर का चबूतरा फल, पिरकिया, अनरसा, चावल, दाल, धोती कुर्ता से लदा था। आगे बढ़ने पर ऐसा हीं दृश्य कई मंदिरों में दिखी। वहाँ एक एक ब्राह्मण पुजारी के पास कई बोड़ें समान थे जो ढोने के लिये टेम्पू खोज रहे थे। ब्राह्मण बोल रहे थे अच्छा हुआ घर घर जाना नहीं पड़ता अब तो यहाँ ही महिलाएं सब समान पहुंचा देती हैं।
        यही धर्म का बिजिनेस है। यहाँ पढ़ कर भी लोग बाढ़ ग्रस्त को नहीं, नक्कारा ब्राह्मण को पेट भरने के लिये मन्दिरों में समान पहुचाने के लिये मारामारी हो रही है।
   यही है ब्राह्मणों द्वारा अपने बच्चों के लिये धर्म का जन्म जन्मांतर तक का व्यापार जो पुनर्जन्म का डर के द्वारा सुनिश्चित की गई है।

     डॉ निराला

चीन के बने हुए सामान का बहिष्कार कर देशभक्त बनें

अरविंद कुमार यादव

अंबानी की कम्पनी रिलायंस ने दुश्मन देश " चीन " को 30 करोड़ " जियो मोबाईल सेट " बनाने का देशभक्त आर्डर दिया !!!
रिलायंस कम्पनी 10-10 करोड़ की 3 खेपों मे ये जियो सेट मँगाएगी, पैक करेगी और भारतियों को 1500-1500 रुपयो मे ( सिक्यरिटी डिपॉज़िट ) इस्तेमाल करने के लिये देगी , बेचेगी नही !!!
अब जब बिक्री नही तो 28% जीएसटी भी नही !!!
मतलब 10 करोड़ सेट की एक खेप मे 1500 रुपये प्रति सेट पर 28% के टैक्स के हिसाब से देश को 42000 करोड़ रुपयों के टैक्स का चूना !!!
कुल तीनो खेप मिलाकर 126000 करोड़ रुपयों के टैक्स का चूना देश को सरकारी संरक्षण मे और सरकार किसकी ?
उच्च स्तरीय भृष्टाचार की ये सीधी सीधी गणित है जो सभी को समझ मे आ ही गई होगी !!!
दूसरी बात Relience सिक्यरिटी डिपॉज़िट के १५०० तो तीन साल बाद लौटा देगी, पर अपना फ़ोन वापस नहीं लेगी । कभी सोचा है - क्यों ????
क्योंकि ये कम्पनी १० करोड़ फ़ोनो की purchasing ( पहली खेप ) यानी ख़रीदी अकाउंट्स में नहीं दिखाएगी ना ही इनको ट्रेडिंग स्टॉक में लेगी बल्कि पन्द्रह लाख करोड़ का ख़र्चा अकाउंट्स में दिखाएगी प्रमोशन के नाम पर , जितना ख़र्चा दिखाएगी तो उतनी कमाई ( profit ) में से कम हो जाएगा और इंकम टैक्स लगभग ३५% यानी पाँच लाख करोड़ की सीधी बचत होगी , दूसरे शब्दों में भारत को पाँच लाख करोड़ के राजस्व का घाटा होगा !
जबकि फ़िलहाल Relience का कुछ भी ख़र्च नहीं होगा क्योंकि फ़ोन की पूरी क़ीमत के बराबर सिक्यरिटी डिपॉज़िट के तौर पर ले लिया है !
इसे कहते हैं मास्टर स्ट्रोक !
एक तीर से तीन शिकार
(१) सरकार को २८% GST की चपत लगने से प्रोडक्ट सस्ता हुआ
(२) १५ लाख करोड़ का खर्च दिखाने से पाँच लाख करोड़ इनकम टैक्स नहीं भरना पड़ा !
(३) मार्केट पर तीन साल के लिए एक तरफ़ॉ क़ब्ज़ा, प्रतियोगी साफ़ !
बाकी देशवासियों से भाजपा सरकार की यही अपील है कि चीन के बने हुए झालर, पिचकारी टाइप सामान का बहिष्कार कर देशभक्त बनें।

हिन्दू कोड बिल

बरसों पहले हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और प्रथम कानून मंत्री डॉ. अंबेडकर ने हिन्दू महिलाओं के संरक्षण के लिए और उन्हें बराबर का अधिकार देने के लिए एक बड़ी पहल की थी।
इस पहल का नाम था ‘‘हिन्दू कोड बिल’’। हिन्दू कोड बिल के माध्यम से महिला को पुरूष के बराबर अधिकार दिए गए थे। महिलाओं को तलाक लेने का अधिकार दिया गया। बिल से हिन्दुओं का एक से ज्यादा विवाह करना प्रतिबंधित कर दिया गया। इस कदम का विरोध भी प्रारंभ हो गया था। विरोध करने के लिए हिन्दू कोड बिल विरोधी कमेटी बनाई गई। इस कमेटी में शामिल लोगों ने स्वयं को धर्मवीर बताया-ऐसे धर्मवीर जो एक धर्मयुद्ध लड़ने जा रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ न सिर्फ इस समिति में शामिल हुआ वरन् उसने अपनी पूरी ताकत बिल विरोधी आंदोलन में झोक दी। इस कमेटी के तत्वाधान में देश में सैकड़ों सभायें की गईं, जुलूस निकाले गए। इन सभाओं में अनेक साधु-संत शामिल हुए। शंकराचार्य ने भी बिल की भर्त्सना की। 11 दिसंबर, 1949 को दिल्ली के रामलीला मैदान में एक आमसभा का आयोजन किया गया। सभा में बोलते हुए अनेक वक्ताओं ने बिल की भर्त्सना की। एक वक्ता ने उसे हिन्दू समाज पर फेंका गया एटम बम बताया। एक वक्ता ने उसकी तुलना अंग्रेजों द्वारा बनाए गए रोलेट कानून से की। एक वक्ता ने कहा कि जैसे रोलेट कानून से अंग्रेजी साम्राज्य का पतन हुआ था वैसे ही इस कानून से नेहरू और उनकी सरकार का पतन होगा। दूसरे दिन असेम्बली की तरफ मार्च में शामिल लोग नारे लगा रहे थे ‘‘हिन्दू कोड बिल का नाश हो, नेहरू जी का नाश हो।’’ जुलूस में शामिल लोग नेहरू जी और डॉ. अम्बेडकर के पुतले जला रहे थे। जुलूस में शामिल लोगों ने शेख अब्दुल्ला की कार पर भी हमला किया।
इस आंदोलन के एक प्रमुख नेता थे स्वामी करपात्री। बिल की निंदा करते हुए उन्होंने डॉ. अम्बेडकर की जाति का उल्लेख करते हुए कहा कि उसे उन मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है जिन मामलों में अंतिम निर्णय ब्राह्मणों का होता है।

स्वामी करपात्री दिल्ली और अन्य स्थानों पर अपने भाषणों के दौरान अम्बेडकर को चुनौती देते थे कि वे हिन्दू शास्त्रों की विवेचना के मामले में उनसे शास्त्रार्थ करें।

अम्बेडकर का कहना था कि हिन्दू शास्त्रों में बहु विवाह का प्रावधान नहीं है। स्वामी करपात्री ने अम्बेडकर के इस दावे को चुनौती दी थी। उन्होंने एक हिन्दू स्मृति का उल्लेख करते हुए कहा कि इस स्मृति में इस बात का प्रावधान है कि यदि पत्नी नशा करती है, अपंग है, चालाक है, बांझ है और खर्चीली है, यदि उसकी जुबान कड़वी है, यदि उसने सिर्फ कन्याओं को जन्म दिया है और उसके पुत्र नहीं हैं, वह अपने पति से घृणा करती है तो एक पत्नि के होते हुए भी उसे दूसरी शादी करने का अधिकार है। उन्होंने इन प्रावधानों का मौलिक स्वरूप भी प्रस्तुत किया था। परंतु स्वामी जी ने यह नहीं बताया कि क्या पत्नी भी ऐसी स्थिति में जब पति आदतन शराबी हो, उसकी कड़वी जुबान हो, वह खर्चीला हो तो वह भी तलाक दे सकती है कि नहीं।
स्वामी करपात्री जी के अनुसार हिन्दू परंपरा में तलाक का प्रावधान नहीं है। शास्त्रों के अनुसार दूसरी जाति के बच्चे को गोद लेना भी प्रतिबंधित है। संपत्ति के अधिकार के मामले में भी महिलाओं को सिर्फ सीमित अधिकार प्राप्त हैं। हिन्दू शास्त्रों के इन प्रावधानों के बावजूद यदि हिन्दू कोड बिल हिन्दुओं पर लादा जाता है तो यह ईश्वर द्वारा बनाए गए नियमों का उल्लंघन होगा। इससे न सिर्फ सरकार का बल्कि देश का नुकसान होगा। बिल का विरोध चालू रहा, स्वयंसेवकों के जत्थे दिल्ली आते थे और नेहरू जी के विरूद्ध नारे लगाते थे। वे साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने का प्रयत्न भी करते थे। उनके नारे होते थे पाकिस्तान तोड़ दो, नेहरू हुकूमत छोड़ दो।

मैंने यह विवरण प्रसिद्ध इतिहासकार रामचन्द्र गुहा की किताब इंडिया आफ्टर गांधी से लिया है, जो इस किताब के पृष्ठ 228 से लेकर 232 में दिया गया है।

इस तरह यह दावे से कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश में वयस्क मताधिकार के द्वारा स्थापित प्रजातंत्र का विरोधी तो था ही वरन् उसके साथ-साथ वह हिन्दू समाज में किसी भी प्रकार के प्रगतिशील परिवर्तन का भी विरोधी था और इसको लेकर संघ ने नेहरू और डॉ. अम्बेडकर के विरूद्ध जहरीला प्रचार किया।
       मित्रो,आज वे पाखण्डी लोग ही इंस्टेंट तलाक रोकने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर ऐसे उछल रहे हैं ,जैसे वे खुद ही हिन्दू पुरुष नहीं ,मुस्लिम महिला हो । वे वही लोग हैं जो अपने घर में कूड़ा जमा रखे रहना चाहते हैं और दूसरों के घर में गन्दगी का शोर मचाते हैं।

हिन्दू नाम का सच्चा इतिहास

 हिन्दू नाम का सच्चा इतिहास :
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हिंदू नाम का कोई धर्म नही है… हिन्दू फ़ारसी का शब्द है । हिन्दू शब्द न तो वेद में है, न पुराण में ,न उपनिषद में ,न आरण्यक में ,न रामायण में, न ही महाभारत में । स्वयं दयानन्दसरस्वती कबूल करते हैं कि यह मुगलों द्वारा दी गई गाली है । 1875 में ब्राह्मण दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की, हिन्दू समाज की नहीं । अनपढ़ ब्राह्मण भी यह बात जानता है । ब्राह्मणो ने स्वयं को हिन्दू कभीनहीं कहा । आज भी वे स्वयं को ब्राह्मण कहते हैं ,लेकिन सभी शूद्रों को हिन्दू कहते हैं । जब शिवाजी हिन्दू थे, और मुगलों के विरोध में लड़ रहे थे ,तथाकथित हिन्दू धर्म के रक्षक थे ,तब भी पूना के ब्राह्मणो ने उन्हें शूद्र कह राजतिलक से इंकार कर दिया । घूस का लालच देकर ब्राह्मण गागाभट्ट को बनारस से बुलाया गया । हिंदू का सच ,गगाभट्ट ने “गागाभट्टी” लिखा ,उसमें उन्हें विदेशी राजपूतों का वंशज बताया तो गया लेकिन ,राजतिलक के दौरान मंत्र “पुराणों” के ही पढे गए, वेदों के नहीं। तो शिवाजी को हिन्दू तब नहीं माना । ब्राह्मणो ने मुगलों से कहा, हम हिन्दू नहीं हैं, बल्कि तुम्हारी तरह ही विदेशी हैं, परिणामतः सारे हिंदुओं पर जज़िया लगाया गया, लेकिन ब्राह्मणो को मुक्त रखा गया । 1920 में ब्रिटेन में वयस्क मताधिकार की चर्चा शुरू हुई । ब्रिटेन में भी दलील दी गई कि वयस्क मताधिकार सिर्फ जमींदारों व करदाताओं को दिया जाए ।
लेकिन लोकतन्त्र की जीत हुई । वयस्क मताधिकार सभी को दिया गया । देर सबेर ब्रिटिश भारत में भी यही होना था । तिलक ने इसका विरोध किया । कहा “तेली,तंबोली ,माली ,कूणबटो को संसद में जाकर क्या हल चलाना है” । ब्राह्मणो ने सोचा ,यदि भारत में वयस्क मताधिकार यदि लागू हुआ तो, अल्पसंख्यक ब्राह्मण मक्खी की तरह फेंक दियेजाएंगे । अल्पसंख्यक ब्राह्मण कभी भी बहुसंख्यक नहीं बन सकेंगे । सत्ता बहुसंख्यकों के हाथों में चली जाएगी । तब सभीब्राह्मणों ने मिलकर 1922 में “हिन्दू महासभा” का गठन किया । जो ब्राह्मण स्वयं को हिन्दू मानने कहने को तैयार नहीं थे, वयस्क मताधिकार से विवश हुये । परिणाम सामने है । भारत के प्रत्येक सत्ता के केंद्र पर ब्राह्मणो का कब्जा है । सरकार में ब्राह्मण,विपक्ष में ब्राह्मण ,कम्युनिस्ट में ब्राह्मण ,ममता ब्राह्मण ,जयललिता ब्राह्मण . 367 एमपी ब्राह्मणो के कब्जों में है । सर्वोच्च न्यायलयों में ब्राह्मणो का कब्जा,ब्यूरोक्रेसी में ब्राह्मणो का कब्जा,मीडिया ,पुलिस ,मिलिटरी ,शिक्षा ,आर्थिक सभी जगह ब्राह्मणो का कब्जा है । एक विदेशी गया तो दूसरा विदेशी सत्ता में आ गया । हम अंग्रेजों के पहले ब्राह्मणो के गुलाम थे अंग्रेजों के जाने के बाद भी ब्राह्मणो के गुलाम हैं । यही वह हिन्दू शब्द है जो न तो वेद में है न पुराण में, न उपनिषद में, न आरण्यक में, न रामायण में ,न ही महाभारत में ।
फिर भी ब्राह्मण हमें हिन्दू कहते हैं । हिन्दू धर्म का विचित्र इतिहास आप भी जाने - मंदोदरी " मेंढकी से पैदा हुई थी ! " श्रंगी ऋषि " " हिरनी से पैदा हुये थे ! - " सीता" " मटकी मे से पैदा हुई थी ! - " गणेश " अपनी माँ के मैल " से पैदा हुये थे ! - " हनुमान " के पिता पवन " कान से पैदा हुये थे ! - हनुमान का पुत्र # मकरध्वज था जो , मछ्ली के मुख से पैदा हुआ था ! - मनु सूर्य के पुत्र थे, उनको छींक आने पर एक लड़का नाक से पैदा हुआ था ! - राजा दशरत की तीन रानियो के चार पुत्र जो, फलो की खीर खाने से पैदा हुये थे - सूर्य कर्ण का पिता था। भला सूर्य सन्तान कैसे पैदा कर सकता है, वो तो आग का गोला है ! " ब्रह्मा के 4 वर्ण यहां वहां से निकले हद है !! " दलित का बनाया हुआ चमड़े का ढोल ,मंदिर में बजाने से मंदिर अपवित्र नहीं होता! " दलित मंदिर में चला जाय तो मंदिर अपवित्र हो जाता है। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं की , ढोल किस जानवर की चमड़ी से बना है। उनके लिए मरे हुए जानवर की चमड़ी पवित्र है, पर जिन्दा दलित अपवित्र....!! " लानत है ऐसे धर्म पर" ....!!! "
बुद्धिजीवी प्रकाश डाले !! दिमाग की बत्ती जलाओ अंधविश्वास भगाऔ यदि पूजा-पाठ करने से ही बुद्धि और शिक्षा आती तो , पंडों की औलादें ही विश्व में वैज्ञानिक-डॉक्टर-इंजीनियर होती. " वहम् से बचों, अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाओ क्योंकि, शिक्षा से ही वैज्ञानिक-डॉक्टर-इंजीनियर और शासक बनते हैं . पूजा-पाठ से नहीं. अतः वहम् का कोई ईलाज नहीं और , शिक्षा का कोई जवाब नहीं. शिक्षित बनो " संगठित रहो " संघर्ष करो " सनातन धर्म मे क्या हुआ ,आप जानते हैं ? इन्द्र ने - गौतम ऋषि की पत्नी "अहिल्या के साथ रेप किया .चन्द्रमा ने अर्क अर्पण करती ब्रहस्पति की पत्नी "तारा के साथ रेप किया .अगस्त्य ऋषि ने सोम की पत्नी "रोहिणी के साथ रेप किया ! ब्रहस्पति ऋषि ने औतथ्य की पत्नी व मरूत की पुत्री "ममता के साथ रेप किया । पराशर ऋषि ने वरुण की पुत्री "काली के साथ रेप किया ! विश्वामित्र ने - अप्सरा "मोहिनी के साथ सम्भोग किया . वरिष्ठ ऋषि ने अक्षमाला के साथ रेप किया ! ययाति ऋषि ने विश्ववाची के साथ रेप किया ! पांडु ने माधुरी के साथ रेप किया । राम के पूर्वज राजा दण्ड ने शुक्राचार्य की पुत्री "अरजा के साथ रेप किया । ब्रह्मा ने अपनी बहिन गायत्री और पुत्री सरस्वती के साथ रेप किया। ऐसी न जानें कितनी घटनाएँ इनके धर्म ग्रन्थों में भरी पढ़ी हैं ,इस पोस्ट को करने का मेरा एक ही मकसद है कि ,मैं हिन्दू धर्म के ठेकेदारों से पूछना चाहता हूँ , इन बलात्कारियों का दहन क्यों नहीँ ? और रावण महान जैसे महा विद्वान, शीलवान व्यक्तित्व का जिसने सीता का अपहरण तो किया पर, कोई शील भंग नहीँ किया, ऐसे नारी को सम्मान देने वाले रावण का दहन आखिर क्यों ? रत्न विचार भगवान से न्याय मिलता तो *न्यायालय नहीं होते। सरस्वती से ज्ञान मिलता तो विद्यालय नहीं होते। दुआओ से काम चलता तो औषधालय नहीं होते। बिन काम किये भाग्य चमकता तो कार्यालय नहीं होते। मंदिर धर्म के दलालों की *निजी दुकान* है, जो कि कुछ *विशेष जाती* के लोगो को ही फायदा पहुँचाने के लिए है। वहाँ वही जाते हैं, जो *दिमाग से गुलाम* होते हैं। सोच बदलो, ये है भारत का असली इतिहास , बाकि सब झूठ है ।
इस पोस्ट के अन्दर दबे हुए इतिहास के पन्ने है। जिसमें *मूलनिवासी द्रविड कौन है? देवी-देवता कौन है?आर्य कौन है?जातिवाद,पूँजीवाद क्या है? आप द्रविड़ शब्द का अर्थ जानते हो? कुछ लोग मेरे ख्याल से नहीं जानते होंगे। उनके लिए मैं संक्षिप्त में जानकारी प्रस्तुत कर रहा हूँ। *द्रविड शब्द सभी ने अपने विद्यार्थी जीवन में अवशय पढ़ा होगा । साथ ही यह भी पढ़ा होगा की भारत देश की सभ्यता आर्य और द्रविड लोगों की मिली-जुली सभ्यता हैl और यह भी पढ़ा होगा की *आर्य बाहर से आये हुए लोग है। हमारे भारतीय इतिहासकार लोगो ने बहुत सारी बातो को दबा दिया हैl भारत में आर्यों का आगमन हुआl ये कौन लोग है? कहाँ से आए?भारत में ये लोग है या नहीl इस बारे में इतिहासकार इतिहास में लिखते नहीं। क्यों? क्योंकी आज भारत देश में इतिहास लिखनेवाले आर्य लोग ही है। लेकिन आप उसे पहचानते नहीं। क्या आपको पता है? आपको शिक्षा कब से मिली ?और आप कौन से वर्ण में आते है? आप इस जाति में क्यों है? आप का इतिहास क्या था? जिस दिन इन बातो को खोजना शुरू करेंगे। आपको उत्तर मिलना शुरू हो जायेगा ।और जब समझ में आएगा तब आपको अहसास होगा की मैं गुलाम हूँ।आर्यों ने हमें घेर रखा हैl अब मैं कुछ करू। क्योंकी द्रविड कोई और नहीं आप ही द्रविड हो।* इतिहास के पन्नोे से *आर्य कोई और नहीं ब्राम्हण,क्षत्रिय,वैश्य ही आर्य है। ये अर्थवा,रथाईस्ट,वास्तारिया जाति के हैl इनका आगमन आज से 4500 साल पहले 2500 ईसा पूर्व भारत में हुआ थाl* ये घुड़-सवारी होते थे और लोहे के तलवार रखते थेl ये अपने साथ गाय भी लेकर आये थे। उस समय *भारत तीन भागो में बटा थाl पश्चिमोत्तर में राजा बलि का राज था। पूर्वोत्तर में राजा शंकर का राज थाl जिसे आप शंकर भगवान कहते होl और दक्षिण में राजा रावण का राज थाl जिसे आप हर साल जलाते हो और खुसिया मनाते होl* आर्य के आगमन के पहले भारत के मूलनिवासी द्रविड लोग थेl उस समय भारत के द्रविड लोग कृषि पशुपालन,पक्के ईटो के घर ,नहाने के लिए स्नानागार, देश-विदेश में ब्यापार ,विज्ञानवादी सोच ,मूर्ती निर्माण कला ,चित्रकारी में कुशल,शांति प्रिय ,एक उन्नत सभ्यता थीl उस समय अन्य देशोसे तुलना करे तो हमारी सभ्यता उनसे काफी विकसित थी।आर्योने सर्वप्रथम राजा बलि के राज में प्रवेश कियाl झुग्गी-झोपडी बनाकर रहने लगेl चोरी-चकारी करना शुरू किया। द्रविड़ो ने राजा से शिकायत कीl द्रविड़ो ने आर्यों को पकड़ कर राजा के सामने हाजिर किये। आर्यों ने पेट का हवाला दियाl राजा बलि दयालु मानवता प्रेमी थे। उसने माफ़ कर दिया और आर्यों के रहने-खाने का बंदोबस्त कर दिया ,और चोरी न करने की सलाह दीl कुछ दिन में राजा और प्रजा के ब्यवहार समझ जाने के बाद आर्यों ने एक योजना बनायीl इसमें *बामन नाम का एक आदमी (जिसे आज विष्णु भगवान कहते है) सभी आर्यों में तेज बुध्दीवान था*l पुरे आर्य ग्रुप के साथ राजा बलि के दरबार पहुचे और कहा राजा साहब हम आपके दरबार में बहुत सुखी हैl पर कुछ और हमें चाहिए दे देते तो बड़ी मेहरबानी होतीl राजा बलि ने कहा मांगो। आर्यों ने कहा राजा साहब हमने सुना है, आपके राज में त्रिवाचा चलता हैl अर्थात तीन वचन। हमें भी त्रिवाचा दीजिये, कही मुकर जायेंगे तो। इस प्रकार आर्यों ने छल-कपट पूर्वक राजा बलि के सामने तीन मांगे रखी। *पहली- राजा साहब हमें ऐसी शिक्षा का अधिकार दो, जिसे चाहे हम दे और न चाहे तो न दे। दूसरी-राजा साहब हमें ऐसा धन का अधिकार दो, जिसे चाहे हम दे न चाहे तो न देl तीसरी- राजा साहब हमें ऐसा राज करने का अधिकार दो, जिसे चाहे उसे राज में बिठाये और न चाहे तो न बिठाये। इसप्रकार आर्यों ने छल-पूर्वक राजा बलि से शिक्षा, धन ,राज करने का अधिकार ले लिए और राज में स्वयं बैठ गए। सैनिक शक्ति में अपने लोगो का कब्ज़ा करवा दिया। फिर राजा बलि को मारकर जमीन में गाढ़ दिया। जिसे कहा जाता है, विष्णु भगवान ने राजा बलि से दान में धरती पर तीन पग जमीन माँगीl ये तीन पग शिक्षा, धन, राज करने का अधिकार हैl जमीन में गाडा इसे बताया जाता है पाताल लोक का राजा बना दिया। आप तो पढ़े-लिखे होl जरा सोचो क्या किसी का पैर इतना बड़ा हो सकता हैl जो पुरी पृथ्वी को ढक ले। और पुरी पृथ्वी पर कब्ज़ा होता, तो विष्णु भगवान को अन्य देश के लोग क्यों नहीं जानते। क्यों नहीं पूजते। इसप्रकार आर्यों ने राजा बलि का राज हड़प लियाl उसी दिन से आर्य और द्रविड(भारत के मूलनिवासी) के बीच युद्ध जारी हैl* इसके बाद *राजा शंकर का राज हड़पने के लिए योजना बनायी। इसके लिए विष्णु ने अपनी बहन की शादी राजा शंकर से करने के लिए सोचा और शादी का प्रस्ताव भेजाl राजा शंकर का सेनापति महिषासुर थाl वो आर्यों की चाल समझ गया था, उसने मना करवा दिया। महिषासुर रोड़ा बन गया। तो आर्य पुत्री पार्वती ने ही महिषासुर को मारने के लिए उसे अपने प्रेम-जाल में फँसाया और खून करने के लिए आठ दिन तक मौका खोजती रहीl नौवे दिन जैसे ही मौका मिला धोखे से त्रिशूलद्वारा हत्या कर दी, और शंकर के पास दासी के रूप में सेवा करने लगी। धीरे-धीरे पार्वतीने अपनी खूबसूरती से शंकर को भी वश में कर लिया। और योजनाबद्ध तरीके से राजा शंकर को नशा की आदत लगा दीl इसप्रकार नशा के आदि होकर राजा शंकर का राज-पाठ से मोह-भंग हो गयाl फिर आर्यों ने उनका भी राज चलाया और नशे से आपका शरीर गर्म हो गया यह कहकर हिमालय पर्वत में रहने की सलाह दीl जिसे आज कैलाश पर्वत कहते है।* इसप्रकार दो राज्यों में आर्यों का कब्ज़ा हो गया। फिर *रावण का राज हड़पने के लिए युद्ध छेढ दिया गया। बिभिशन के दोगलापन के कारण छल से रावण को भी भारी मसक्कत के बाद आखिर में मार दिया गया।* इसप्रकार तीनो राज्यों में आर्यों ने कब्ज़ा कर लिया। *आर्यों ने अपने को देव और भारत के मूलनिवासी(द्रविड) को असुर कहाl इसप्रकार 1500 वर्षो तक चले युद्ध के बाद द्रविड पूर्ण रूप से हार गए। यह युद्ध इतिहास में देवासुर-संग्राम के नाम से प्रसिद्ध है।* *देवासुर-संग्राम के बाद ही जाति व वर्ण व्यवस्था बनायी। आर्यों ने अर्थवा को ब्राम्हण,रथाईस्ट को क्षत्रिय और वस्तारिया जाति को वैश्य(बनिया) घोषित किया और भारत के मूलनिवासी(द्रविड) को शुद्र घोषित किया।* और शुद्र में दो वर्ग बनाये जितने लोगो ने लड़ा-भिड़ा उसे अछूत शुद्र कहा और बाकि को सछुत शुद्र घोषित किया। तथा सामाजिक एकता तोड़ने के लिए उन्होंने सिर्फ शुद्र की ही जाति बनायीl *आज ये जाति लगभग 6743 की संख्या में हैl* इसकी लिस्ट गूगलनेट में देख सकते है। *ब्राम्हण, क्षत्रिय,वैश्य की कोई जाति नहीं होतीl उनका सिर्फ वर्ण ही होता है। जैसे शर्मा, दुबे, चौबे, श्रीवास्तव ,द्विवेदी इनके गोत्र है जाति नहीं*यकिन न हो तो चतुराई से पुछ कर देख लेना। इस *देवासुर-संग्राम में जो लोग लड़-भीड़ कर जंगल में शरण लीl और युद्ध जारी रखाl वो वन शरणागत शुद्र(आदिवासी) ST कहलाये ,और जो लोग लड़-भीड़ कर हार कर वही समाज के बाहर रहने लगे वो (अछूत) SC कहलायेI और बाकि शुद्र सछुत शुद्र कहलायेl जिनमें अन्य (पिछड़ा वर्ग) OBC आता है।* जिसने जैसा संग्राम किया उसे उतना ही घृणित कार्य दिया गया। *रामायण, महाभारत ,चारो वेद ,उपनिषद,पुराण उसी समय के लिखे गए ग्रन्थ है। इस प्रकार जातियाँ द्रविड की सामाजिक एकता तोड़ने के लिए बनायी गयी और देवी-देवता धार्मिक गुलाम बनाने के लिए बनाए गए।* *हम देवी-देवता के रूप में सभी आर्यों की पूजा करते हैl ये सारे देवी-देवता झूठे(false) है। यह सत्य होता तो पुरे विश्व में देवी-देवता मानतेl भारत में ही क्यों?* इसप्रकार *शिक्षा का अधिकार ब्राम्हण ने ले लियाl क्षत्रिय ने राज करने का, वैश्य ने धन का अधिकार ले लिया और शुद्र(द्रविड) मूलनिवासी को तीनो वर्णों की सिर्फ सेवा करने का काम दिया गया। जिसे आपने कहीं न कहीं अवश्य पढा होगाl* इसके बाद *महावीर स्वामी ने जाति व वर्ण ब्यवस्था का विरोध किया थाl (583 ईसा पूर्व में) पर ज्यादा सफल नहीं हुए।* फिर *गौतम बुद्ध ने (534 ईसा पूर्व) बौद्ध धर्म जो मानव जाति का प्रकृति प्रदत धम्म को खोजाl जो शाश्वत धम्म है। जिसने पुरे विश्व के मानव जीवन का कल्याण खोज निकालाl जाति व वर्ण व्यवस्था को लगभग समाप्त कर दिया था। गौतम बुद्ध के बाद मौर्य वंश में चन्द्रगुप्त मौर्य अशोकने बौद्ध धर्म को नई उचाई दीl अशोक के पुत्र-पुत्री ने कई देशो में बौद्ध धम्म का प्रचार-प्रसार कियाl* जो आज के समय में *100 से अधिक देश बौद्ध धर्म को अपना चूके हैl* कही अंशिक तो कही पूर्ण रूप से। *मौर्य वंश के अंतिम बौद्ध राजा बृहदस्थ ने गलती कीl उसने सेनापति के रूप में ब्राम्हण पुष्यमित्र शुंग को घोषित किया। शुंग ने सभी ब्राम्हणो को सेना में भर्ती कर दिया और सेना के सामने अंतिम बौद्ध राजा बृहदस्थ की हत्या कर दीl और 84000. स्तूप तोड़ दिए गए। पुष्यमित्र शुंग का शासनकाल 32 वर्ष (184 ईसा पूर्व -148 ईसा पूर्व)है। लाखो बौद्धो को काट दिया गया ।एक बौद्ध सिर काटकर लाने का इनाम 100 नग सोने के सिक्के रखा गया। भारत की धरती खून से रक्त-रंजित हो गयी।* बहुतो ने दुसरे देश जाकर अपनी जान बचायी। सारे बौद्ध ग्रंथ घर से खोज-खोज कर जला दिए गए। इसप्रकार जिस देश में बौद्ध धम्म ने जन्म लिया उस देश से गायब हो गया। आज भारत में जो भी बौद्ध ग्रंथ, त्रिपिटक लाये गए वो सब अन्य देशो से लाये गए है। बादमें *पुष्यमित्र शुंग ने मनुस्मृति लिखीl जिसमें शुद्रो के सारे मानवीय अधिकार छीन लिए गए। रामायण, महाभारत को फिर से नए ढंग से नमक मिर्ची लगाकर लिखा गया। तब से 2000 साल तक शुद्र (SC/ST/OBC) को शिक्षा और धन का अधिकार नहीं मिला थाl* इस बीच अनेको संत कबीर,गुरुनानक,रविदास,गुरु घासीदास ,और अनेक महापुरुष हुएl जिन्होंने भक्ति मार्ग से लोगों को सत्य का अहसास करायाl लेकिन नैतिक शक्ति-शिक्षा ,राजनितिक शक्ति - वोट देने के अधिकार ,सैनिक व शारीरिक शक्ति-कुपोषण के कारण क्षीण हो गया थाl *ब्राम्हण, पेशवाई में अचूतो की स्थिति अति दयनीय हो गयी थीl इस समय अचूतो को गले में हांड़ी और कमर में झाड़ू बांधकर चलना पडता थाl यह 12 वर्षो तक चलाl 1जनवरी 1818 को 500 महार सैनिकों ने 28000 पेशवाई लगभग युद्ध करके ख़त्म कर दीl जिसमें 22 महार सैनिक शहीद हुए थेl* मुग़ल राजाओ ने भी ब्राम्हणों से साठ-गाठ कर भारत को गुलाम बनाया और ब्राम्हणों के मर्जी से शुद्र को शिक्षा नहीं दीl लेकिन जहांगीर के शासन काल में थाॅमस मुनरो आये थेl यहाँ की अजीब स्थिति देखकर वह दंग रह गए ,उसी के बाद डच,पोर्तूगाली,फ़्रांसिसी,अंग्रेज आये और कंपनी स्थापित कर भारत को गुलाम बनायाl *थाॅमस मुनरो ने सबको शिक्षा देना शुरू कियाl जिसमें पहले व्यक्ति महात्मा ज्योतिबा फुले ने शिक्षा पायीl जो की माली जाति के अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैl शिक्षा पाने के बाद उन्होने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को भी पढायाl इसप्रकार सावित्रीबाई फुले सवर्ण महिला ,शुद्र महिला ,अतिशुद्र महिला में शिक्षा पानेवाली पहली महिला बनीl* ये आर्य सवर्ण लोग अपनी पत्नी को भी शिक्षा नहीं देते, क्योंकी उनकी पत्नी भी द्रविड महिला ही है। इसलिए कहा गया है *ढोल ग्वार शुद्र , पशु , नारी ये सब है ताडन के अधिकारीl शुद्रो को शिक्षा 19वी सदी में 1840 के आसपास ही मिलना शुरू हुआl* सारी क्रांति शुद्रोने(द्रविड) ब्रिटिश शासनकाल में ही कीl *रामास्वामी पेरियार , डाॅ. बाबासाहेब आंबेडकर के जीवनकाल में कितनी छुवाछुत थीl किसी से छुपा नहीं है। डाॅ.आंबेडकर अछूत समाज में पहले व्यक्ति है, जिन्होंने पहली बार मेट्रिक पास कियाl ग्रेजुएशन किया ,M.A. किया।देश-विदेश से अनगिणत डिग्रीयाँ हासिल कीl* *डाॅ.आंबेडकर साहब जैसे संघर्ष आज तक किसी ने नहीं किया। अछूत कहे जाने वाले अस्पृश्य समाज को तालाब का पानी पीने का ,मंदिर में प्रवेश का अधिकार नहीं थाl चवदार तालाब का पानी पीने का सामूहिक प्रयास डाॅ.आंबेडकरने पहली बार कियाl* जिसमें अछूतो के संग बहुत मारपीट की गयीl करीब 20अछूत इस हमले में जख्मी हो गए थेl फिर कालाराम मंदिर में प्रवेश किये। बाबा साहब ने कई सभाए ली,कई समितियों का निर्माण किया । *25दिसंबर 1927 को मनुस्मृति का दहन किया गयाl यही वह ग्रंथ है, जिसमें शुद्रो को नरक सा जीवन जीने के लिए तानाशाही आदेश जारी किये गए।* देश स्वतंत्र होनेवाला थाl समय *बाबासाहब से बड़ा कोई विद्वान ही नहीं थाl इसकारण संविधान लिखने का अवसर बाबा साहेब को मिलाl आज अचूतो को ,शुद्रो को ,महिलाओं को जो भी अधिकार मिले है, चाहे कोई भी फील्ड हो सब बाबासाहब के अथक प्रयास से संभव हुआ है। इसे SC/ ST/OBC/मायनॅरिटी माने या न माने ये उनके ऊपर निर्भर है। अनुसूचित जाति कल्याण आयोग, अनुसूचित जनजाति कल्याण आयोग, अन्य पिछड़ा कल्याण आयोग, धार्मिक अल्प संख्यक कल्याण आयोग (SC/ST/OBC/Minirity) के लिए बनाया गया है।* आपको संविधान में सवर्ण कल्याण आयोग कही नहीं मिलेगा। क्यों ? जरा सोचे यह *संविधान भारत के मूलनिवासी (द्रविड) के हित व उनका सम्पूर्ण विकास के लिए बनाया गया है। हर जरुरी अधिकार सविधान में डाले गए है। लेकिन अफ़सोस की मूलनिवासीयों (द्रविड़) ने आज तक संविधान को खोलकर देखा ही नहीं और सवर्ण के साथ ही संविधान को बिना पढ़े घटिया और बदलने की बात करता हैl* वही अन्य देश के राष्ट्रपति,PM ,कानून के जानकार इसे दुनिया की सबसे महान संविधान कहता हैl *बाबसाहेबने संविधान लिखकर मूलनिवासी (द्रविड) को आधी आजादी दी गयी है और आधी आजादी जिस दिन हमारे द्रविड भाई एक हो जायेंगे उस दिन सम्पूर्ण आजादी मिलेगी।आज व्यापार में 95%, शिक्षा में 75%, नौकरी में 75% ,जमीन में 90% इन आर्यों का ही कब्ज़ा है। भाईयों जरा गौर करो SC/ST/OBC/Minirity के लोग कितने % व्यापार में हाथ-पाव जमाये हो? 85% मूलनिवासी (द्रविड) सिर्फ ग्राहक बने हो, दुकानदार तो मुख्य रूप से सवर्ण ही है।* बड़े-बड़े उद्योग ,कंपनी, बड़ी-बड़ी दुकाने हर प्रकार का दुकाने कौन चला रहा हैl गौर करोगे तो सब समझ आ जायेगाl लेकिन दुःख की बात है कि, हमारे भाई दूर की सोच रखते ही नहींl *आज सिख, बौद्ध भी द्रविड हैl इसाई,मुस्लिम भी द्रविड हैl मुग़लकाल में हमारे ही द्रविड भाईयो ने हिंदू धर्म की हीनता देख कर मूस्लिम धर्म को अपनायाl अंग्रेजो के शासनकाल में हमारे द्रविड भाईयों ने ही इसाई धर्म को अपनाया। और सिखों ने अपना अलग सा धर्म बनाया। इस कारण सवर्ण लोग कभी सिख दंगा, कभी इसाई दंगा, कभी मुस्लिम दंगा, कभी बौद्ध पर हमला करता रहता हैl ये सब इनकी सोची-समझी साजिश होती है। ''67 साल के बाद आज जैसे ही बीजेपी सत्ता में बहुमत से आई है। गौर कीजिये क्या हो रहा हैl धर्म-धर्म रट रही हैl भारत को हिंदुस्तान करना चाहते है। सिख हिन्दू थे, घर वापसी करो ऐशी बाते करते हैl इनके मंत्री बोल रहे है साध्वी, नाथूराम गोडसे देशभक्त हैl जो आपके राष्ट्रपिता को तीन गोली ठोकता है। 4-5 बच्चे पैदा करो एक इनको दो, एक बोर्डर को दो, बाकी अपने पास रखोl कितना सम्मान करते है महिलाओं का सोचो। 2021तक सबको हिन्दू बनाने की धमकी दिये जा रहे हैl तो अल्पसंख्यक कहा जायेंगे। इसी कारण ही बाबासाहब ने अल्पसंख्यक को कुछ विशेष अधिकार दिए थेl ताकि बहुसंख्यक इन पर हावी न हो सके। गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करना चाहते है, क्योंकि पुन: युद्ध करा सके। इतने सारे बेतूके बयान दे रहे है और मोदी चुप है क्यो? द्रविड भाइयो अब एक हो जाओl यह समय खतरे से भरा हैl अगर टूट कर रहोगे तो फिर याद रखना इतने दिनो तक ब्राम्हणवाद ने मारा अब पूँजीवाद मारेगा और वर्ग संघर्ष की स्थिति निर्मित होगीl शिक्षा का भगवाकरण करके आपके दिमाग को मार रहे है।

‬[ये फर्क है वैदिक धर्म और बौद्ध धम्म में]

*🇮🇳 "विश्व इतिहास में गौरवशाली सह अद्वितीय 'मौर्य शासन काल' एवं मौर्य सम्राटों (बौद्ध कालिन) के शासन में अखंड भारत की आदर्श महानता/पहचान"* 🇮🇳
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1.चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
     323 - 299 ई०पू०

2.सम्राट बिंदुसार मौर्य
    299 - 274 ई०पू०

3. प्रियदर्शी सम्राट अशोक महान
     274 - 234 ई०पू०

4. सम्राट कुणाल मौर्य
     234 - 231 ई०पू०

5. सम्राट दसरथ मौर्य
     231 - 223 ई०पू०

6. सम्राट सम्प्रति मौर्य
     223 - 215 ई०पू०

7. सम्राट शालिशुक मौर्य
     215 - 203 ई०पू०

8. सम्राट देववर्मा मौर्य
     203 - 196 ई०पू०

9. सम्राट सतधन्वा मौर्य
    196 - 190 ई०पू०

10.सम्राट वृहद्रथ मौर्य
     190 - 184 ई०पू०

ये है ऐतिहासिक एवं गौरवशाली अखंड भारत में मौर्य वंश के अद्वितीय 10 सम्राटों/राजाओं के सर्वोत्तम शासन काल का विवरण। गौरवशाली सह अद्वितीय मौर्य शासन काल के 139 वर्ष विश्व इतिहास में एक अलग स्थान रखते हैं।
🌻इसी समय में "अखण्ड भारत का निर्माण" हुआ था।
🌻इसी समय में भारत "विश्व गुरु" कहलाता था।
🌻इसी समय में भारत "सोने की चिड़िया" कहलाता था।
🌻इसी 139 वर्षों में भारत "विश्व विजयी" कहलाता था।
🌻इसी समय चन्द्रगुप्त मौर्य के नेतृत्व में विश्व की प्रथम संयुक्त सेना का सफल सह विजयी सेना का निर्माण हुआ था।
🌻इसी समय विश्व में अखंड भारत की सेना सबसे विशाल और अजेय थी।
🌻इसी समय में भारत विदेशी आक्रमणकारियों से भयमुक्त/चिंतामुक्त था।
🌻इसी समय में सिकंदर-सेल्युकस जैसे आक्रमणकारी को चन्द्रगुप्त मौर्य के सामने अपनी हार और भारत की विजय स्वीकार करनी पड़ी थी।
🌻इसी समय में भारत विश्व की सबसे मजबूत समावेशी, मानवीय, सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, मैत्री इत्यादि की ताकत होता था।
🌻इसी समय में भारत में विदेशी छात्रों का आगमन शुरू हुआ।
🌻इसी समय में भारत पूरे विश्व में व्यापार की शुरुआत किया।
🌻इसी समय मे सबको शिक्षा, स्वास्थ्य, संपति, समावेशी मौलिक जीवन का समान अधिकार होता था।
🌻इसी समय में समृद्धशाली भारत का निर्माण हुआ।
🌻इसी समय में भारत "प्रबुद्ध भारत" कहलाता था।
🌻इसी समय में भारत सत्य,  करुणा, प्रेम, मैत्री, बंधुत्व, शील, प्रज्ञा इत्यादि से शांतिमय सह सुखमय भारत था।
🌻इसी समय का शासन मानवता, समानता, लोक कल्याणकारी, राष्ट्रीयता, समावेशी समाज सह राष्ट्र विकास पर आधारित था।
🌻इसी समय का "अशोक स्तम्भ" स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय चिन्ह/प्रतीक है। जो प्रत्येक राष्ट्रीय मुद्रा एवं दस्तावेज पर अंकित रहता है।
🌻इसी समय का "सत्यमेव जयते" राष्ट्रीय वाक्य है।
🌻इसी समय का "अशोक चक्र" भारत के तिरंगे में प्रगति प्रतीक नीले रंग में चक्र एवं राष्ट्रीय सम्मान है।
🌻स्वतंत्र भारत का राजकीय पथ "अशोक पथ" एवं केन्द्रीय हॉल "अशोक हॉल" है।
🌻इसी समय का राष्ट्रीय पशु "शेर/सिंह" और राष्ट्रीय पक्षी "मोर" है।



*हिन्दू एवं इसका सच*
 कोई धार्मिक स्थल चर्च, मस्जिद, गुरुद्वारा, बौद्ध विहार इत्यादि में उसी धर्म के लोगों का प्रवेश वर्जित नहीं, पर हिन्दू धार्मिक स्थल मन्दिर में हिन्दू दलित एवं कई जगह हिन्दू महिलाएं भी नहीं जा सकती, मेंस पीरियड में तो सभी मन्दिरों में वर्जित है। जब अपने ही धार्मिक स्थल पर प्रवेश वर्जित है तो उसे अपना मानना क्या बेवकूफी नहीं है?
दक्षिण के अनेकों मन्दिरों में महिलाएं अपने प्रवेश के लिए आंदोलन किये, फिर भी बहुत से मन्दिर में अभी भी महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। जिस न्यायिक सिस्टम हम जा ही नहीं सकते, वह अपना न्यायालय कैसे है? जिस घर में या मन्दिर में जा ही नहीँ सकते वह अपना घर एवं पूजा स्थल कैसे?
     धर्म सिर्फ शोषण का हथियार है।
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         Out of thousands of technological innovations and many theory we are studying these all are  products of christians not a single innovations are of hindu either mobile, computer to any one we are using.
           We say, hindu are monogamy, but  It is only law, not in social practices. You may see 20 grandfathers around you at least 25% definitely may have polygamy.
            Hindu only criticize muslims, but they do not observe their legends or God.   
               Dropadi had 5 husbands, Dashrath had 3 wives. Brahma married his daughter.    
              Yudhishthir was infamous gambler, who lost all properties even his wife, but among Hindu he is known as dharmaraj. Is it not a paradox?
             Sita was ousted by Ram without talaq. 
     Widow remarriage is still not permissible in Hindu, in contrast prevalent in muslims.
      Widow were fired at her husband pyre in hindu not in muslims. 
           Ganga donation of first son
   and kashi karwat an inhumane killing of old is a hindu tradition.
     Huge examples are there, still we say hindu a great religion. *Is it not a mockery?*
       In rural India more in Haryana, you will observe highly prevalent parda system among Hindu still we criticize over muslim veil.
       सिर्फ डिंग हांकने एवं क्रिशचन- मुस्लिम को बुराई करने से नहीँ होता, बल्कि तार्किक, वैज्ञानिक एवं पारदर्शिता के पैमाने पर पर आंकना पड़ता है, जिसमें हिन्दू कहीं नहीँ टिकता।।
              सिर्फ यहाँ आडम्बर एवं बकवास है। कुंभ में लाखों नागा हिमालय से अवतरित होते हैं एवं अखाड़े में अपना युद्ध कौशल दिखाते हैं, पर उसी हिमालय पर चीन एवं पाकिस्तान के सेना आता है, तो ये नागा कहीं भी सीमा बचाने नहीं आते। 
      वहीँ, मुस्लिम धार्मिक लोग जिसे हम मुस्लिम आतंकवादी कहते हैं, वो बिना अखाड़े में प्रदर्शन किये सीमा पार कर भारत से लड़ने आते हैं।
      यही फर्क है हिन्दू एवं मुस्लिम धर्म के पैरोकार का।
      Only 3% Brahminic religion was taken it's fold to all Indians in the name of hindu.
      In fact , Brahimins are invaders of Eurasia, who destroyed our rich traditions and imposed waste cultural practices in the name of rituals and generated many nonscientific books like ramayan, ved, ramayan, upnishad etc. That's why India was unable to innovate any things.
        धार्मिक झूठी कहानी को अगर जस्टिफाई करते हैं तो समझ आती है कि क्या बन्दर पढ़ कर पत्थर पर लिख सकते हैं। जो हनुमान पृथ्वी से कई गुणा सूर्य को निगल गया उसे समुद्र पार करने के लिए पुल की क्या आवश्यकता। सभी बकवास है। 
           सूर्पनखा एक महिला का नाक काटना एवं होलिका का प्रत्येक साल दहन करना क्या नारी के साथ घृणित अपमान नहीं है, चाहे दोष कितना भी हो?
         वहीँ नीच जाति के नाम शूरवीर धनुर्धर एकलव्य का अंगूठा काटने वाले द्रोणाचार्य के नाम पर अवार्ड क्या एक्सट्रीम ब्रह्मिनिज्म की पराकाष्ठा नहीं है?
         Be rational, scientific and secular
          All Religious nations are destroyed in itself, only scientific nations survive.
     Mythology itself explain myth यानि झूठ का स्टडी। इसे सत्य मानना क्या बेवकूफी नहीँ है।
            मैं सुना था, नासा ने सरस्वती नदी एवं पुष्पक बिमान इत्यादि खोज लिया है, पर सोर्स देखा तो समझ गया ये आरएसएस द्वारा फेका गया है, नासा द्वारा नहीं।
     कुछ दिन पहले न्यूज आया गुजरात के गिर गाय के गोबर एवं मूत्र में सोना पाया जाता है। तो फिर भैस में क्यों नहीं? जब वही भोजन भैंस भी खाती है।
  सब बकवास है, सिर्फ धार्मिक fervour बढ़ाने के लिये।
            हमें बताया गया गाय के दूध से दिमाग पतला होता है एवं भैस के दूध से मोटा, पर सब झूठ।
  भैंस के दूध में 18% सॉलिड है जबकि गाय में 12% सॉलिड एवं 88% पानी। यानि भैस के दूध में गाय से डेढ़ गुना ज्यादा nutrients है तो कौन फायदेमंद होगा?
   खुद सोंचे?
  चुकि आर्य गाय लेकर आये थे, पर भैस भारत जैसे गर्म प्रदेश का जानवर है, इसीलिए इस पर अनेकों कहानियां बनाई गई। यमराज की सवारी, भैंस के आगे बिन बजाये। भैस का दूध अपवित्र पूजा में प्रयोग युक्त नहीं।
  ये सब मूलनिवासी को हतोत्साहित करने का आडम्बर।
         यहाँ बौद्दिस्ट धर्म के खिलाफ इनके पवित्र पीपल पर हांडी टँगवाया एवं भुत का अड्डा बनाया, पवित्र मुंडन को अगदेवा मुंडन। इनके दार्शनिक गुरु घण्टाल को ठग इत्यादि।
      राम रावण कहानी भी ब्राह्मणों एवं मूलनिवासी बौद्दिस्टों की लड़ाई ही है।
             अगर देव एवं राक्षस अलग होते तो इनके फॉसिल्स जरूर मिलते, जैसे क्रोमग्नन एवं निएंडरथल मैन के मिले हैं। फिर रावण ब्राह्मण था, तो राक्षस कैसे है? 
   बहुत से ऐसे तुलसीदास जी फेंके हैं , जिसे कुछ लोग सत्य मान लेते हैं। ये बनावटी कहानी है सिर्फ इंटरटेनमेंट के लिये।
      कहते हैं रावण 100 भाई था इसके 10 सिर थे। कौरव भी 100 भाई। इन दोंनो में दो जीरो है। जीरो का खोज आर्यभट्ट 5वी सदी में किया था। तो रामायण महाभारत की घटना 5वी सदी बाद हुई होगी जिस ज़ीरो द्वारा गिना गया। तो इसे ईसा से भी पहले क्यों मानते हैं? बहूत चीजें तर्क पर नहीँ टिकते।
          गरुड़ पुराण जिसे ईसा से पुराना माना जाता है, इसमें लिखित है संकट होने पर छाता एवं जुता ब्राह्मणों को दान करने पर समस्या खत्म।
          छाता एवं जूता 17वी सदी में चीन में अविष्कार हुआ तो फिर ये किताब इनके बाद ही लिखी गयी। 
      प्रिंटिंग प्रेस एवं पेपर का अविष्कार भी 15वी सदि बाद हुई है तो सभी किताबें इसके बाद लिखी गयी है, पर इसे ईसा पहले यानि 2100 साल से भी पहले का बताया जाना क्या लोगों के इमोशन के साथ चीटिंग नहीं है?   हिस्ट्री एवं मिथ दोनों को एक मे मिलाया नहीँ जा सकता। 
  हड़प्पा हिस्ट्री है, क्योंकि इसका एविडेन्स है। पत्थर का इंस्ट्रूमेंट, टूल्स, कॉइन्स, अर्चिटेक्चर, लिपि इत्यादि।    
               पर, मिथॉलजी सिर्फ इंटरटेनमेंट है जैसे डोरेमोन की कहानी बच्चे देखते हैं।
        अतः, धर्म ओपियम एवं खास लोगों का बिजनस है इसे समझें। 

                 *डॉ निराला*

 1918 में पहली बार इस्तेमाल हुआ 'हिन्दू धर्म' शब्द :

तुलसीदास ने रामचरित मानस मुगलकाल में लिखी, पर मुगलों की बुराई में एक भी चौ!!!पाई नहीं लिखी.

क्यों?

क्या उस समय हिंदू मुसलमान का मामला नहीं था? हां, उस समय हिंदू मुसलमान का मामला नहीं था क्योंकि उस समय हिंदू नाम का कोई धर्म ही नहीं था.

तो फिर उस समय कौनसा धर्म था?

उस समय ब्राह्मण धर्म था और ब्राह्मण मुगलों के साथ मिलजुलकर रहते थे, यहाँ तक कि आपस में रिश्तेदार बनकर भारत पर राज कर रहे थे. उस समय वर्ण व्यवस्था थी. वर्ण व्यवस्था में शूद्र अधिकार-वंचित था, जिसका कार्य सिर्फ सेवा करना था. मतलब सीधे शब्दों में गुलाम था.

तो फिर हिंदू नाम का धर्म कब से आया?

ब्राह्मण धर्म का नया नाम हिंदू तब आया जब वयस्क मताधिकार का मामला आया. जब इंग्लैंड में वयस्क मताधिकार का कानून लागू हुआ और इसको भारत में भी लागू करने की बात हुई.

इसी पर तिलक ने बोला था, "क्या ये तेली तम्बोली संसद में जाकर तेल बेचेंगे? इसलिए स्वराज इनका नहीं मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है. हिन्दू शब्द का प्रयोग पहली बार 1918 में इस्तेमाल किया गया.

तो ब्राह्मण धर्म खतरे में क्यों पड़ा?

क्योंकि भारत में उस समय अँग्रेजों का राज था, वहाँ वयस्क मताधिकार लागू हुआ तो फिर भारत में तो होना ही था.

ब्राह्मण 3.5% हैं. अल्पसंख्यक हैं. राज कैसे करेंगे?

ब्राह्मण धर्म के सारे ग्रन्थ शूद्रों के विरोध में, मतलब  हक/अधिकार छीनने के लिए, शूद्रों की मानसिकता बदलने के लिए षड़यंत्र का रूप दिया गया.

आज का ओबीसी ही ब्राह्मण धर्म का शूद्र है. SC (अनुसूचित जाति)) के लोगों को तो अछूत घोषित करके वर्ण व्यवस्था से बाहर रखा गया था, क्योंकि उन्होंने ही यूरेशियन आर्यों से सबसे ज्यादा संघर्ष किया था.

ST (अनुसूचित जनजाति) के लोग तो जंगलों में थे उनसे ब्राह्मण धर्म को क्या खतरा? उनको तो यूरेशियन आर्यों के सिंधु घाटी सभ्यता से संघर्ष के समय से ही वन में जाकर रहने पर मजबूर किया. उनको वनवासी कह दिया.

ब्राह्मणों ने षड़यंत्र से हिंदू शब्द का इस्तेमाल किया जिससे सबको समानता का अहसास हो.

पर ब्राह्मणों ने समाज में व्यवस्था ब्राह्मण धर्म की ही रखी. उसमें जातियां रखीं. जातियां ब्राह्मण धर्म का प्राण तत्व हैं, इनके बिना ब्राह्मण का वर्चस्व खत्म हो जायेगा.

इसलिए उस समय हिंदू मुसलमान की समस्या नहीं थी. ब्राह्मण धर्म को जिंदा रखने के लिए वर्ण व्यवस्था थी. उसमें शूद्रों को गुलाम रखना था.

इसलिए

तुलसीदास ने मुसलमानों के विरोध में नहीं शूद्रों के विरोध में शूद्रों को गुलाम बनाए रखने के लिए लिखा.

ढोल गंवार शूद्र पशु नारी।
ये सब ताड़न के अधिकारी।।

अब जब मुगल चले गये, देश में SC/ST/OBC के लोग ब्राह्मण धर्म के विरोध में ब्राह्मण धर्म के अन्याय अत्याचार से दुखी होकर इस्लाम अपना लिया तो ब्राह्मण अगर मुसलमानों के विरोध में जाकर षड्यंत्र नहीं करेगा तो SC/ST/OBC  के लोगों को प्रतिक्रिया से हिंदू बनाकर, बहुसंख्यक लोगों का हिंदू के नाम पर ध्रुवीकरण करके अल्पसंख्यक ब्राह्मण बहुसंख्यक बनकर राज कैसे करेगा?

इसलिए आज हिंदू मुसलमान कि समस्या देश में खड़ी कि गई है तथाकथित हिंदू (SC ST OBC) मुसलमान से लड़ें, मरें.

क्या कभी आपने सुना है कि किसी दंगे में कोई ब्राह्मण मरा हो? जहर घोलनें वाले कभी जहर नहीं पीते हैं.

इसलिए, यूरेशियन ब्राह्मण सदैव सुरक्षित. कोई दर्द नहीं कोई फर्क नहीं, आराम से टीवी में डिबेट के लिये तैयार !